श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर ध्यान गुरु आचार्य सम्राट डॉ. शिव मुनि जी म.सा. ने आनन्द श्रावक के प्रसंग का उल्लेख करते हुए अपने उद्बोधन में फरमाया कि स्त्री और पुरुष गृहस्थ जीवन की गाड़ी के दो पहिए हैं। यदि दोनों पहियों में कोई दोष है या वे कमज़ोर हैं तो गाड़ी को चला नहीं सकेंगे। यदि उनमें विषमता है, एक पहिया बड़ा है, एक छोटा है, तब भी गाड़ी चल नहीं सकती। पहिए दृढ़ और सम होने चाहिएं। उनमें किसी प्रकार का दोष नहीं होना चाहिए। तब तो वे गाड़ी को अपने गन्तव्य तक पहुंचा देते हैं।
उन्होंने फरमाया कि जैन धर्म दो बातों पर आधारित है-विवेक और यतना। प्रत्येक कार्य विवेक से करो। उसने कार्य पर प्रतिबंध नहीं लगाया। उसने कहा-जो कार्य करो, विवेक से करो। यतना से करो। जैन धर्म ने यह नहीं कहा कि भोजन करना छोड़ दो। शरीर का ख्याल न करो। शरीर की सार-संभाल मत करो। ऐसा जैन धर्म नहीं कहता, किंतु वह विवेक विचार देता है। आप सारा दिन तो नहीं खाते रहते। सब जगह नहीं खाते रहते। आपने खाना खा लिया। अब कम से कम एक घण्टा तो कुछ नहीं खाएंगे। यदि आप में मर्यादा, विवेक, नियम नहीं है तो व्यक्ति कहीं भी, कभी भी खाने लग जाएगा। शारीरिक हानि भी है, आदत भी खराब होती है, दूसरों को भी बुरा लगता है, पेट भी भारी होता है और कोई न कोई बीमारी उत्पन्न होती है। इसके साथ इंद्रियां चंचल होती हैं। विकार भी पैदा होते हैं। आचार प्रभावित होगा। चारित्र खराब हो गया, जीवन खराब होगा। जीवन बिगड़ गया तो लोक बिगड़ गया। लोक बिगड़ गया तो परलोक बिगड़ गया। इस प्रकार व्यक्ति के लोक-परलोक दोनों बिगड़ जाते हैं।
आनंद श्रावक विवेक यतना से चल रहा है। वह समय का सदुपयोग करता है। आनंद श्रावक ऐसा संवर भी करता था। सामायिक वह दोनों समय करता था। एक महीने में छह पौषध-अष्टमी, चौदस, पूर्णिमा, अमावस्या को करता है। ज्ञानी है, सम्यक्त्वी है, शास्त्रों का उसे ज्ञान है। अपने बारह व्रतों की विवेक यतना से पालना कर रहा है। श्राविका व्रतपालन भी कर रही है और सहयोग भी दे रही है, सराहना करती है, सौभाग्य समझती है कि मुझे ऐसा पति मिला। वह समझता है कि यह मेरा सौभाग्य है कि इस प्रकार का जीवन साथी मिला।
इससे पूर्व श्रमण संघीय प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने तत्वार्थ सूत्र वांचन में सातवें अध्याय की चर्चा करते हुए फरमाया कि व्यक्ति स्वयं का अवलोकन करे कि उसका चौबीस घंटे में ध्यान कहां पर है? यदि मन पर में है तो कर्मों का बंधन और यदि जीव में है तो महानिर्जरा चल रही है। मन में शुभ चिंतन है तो पुण्य का कार्य, अशुभ चिंतन पाप का कर्म बंधन कर रहे हैं।
प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में विनय और परिषह के बारे में बताया।
मधुर गायक श्री निशांत मुनि जी म.सा. ने ‘‘अरे आत्मा रे तूझे किसका डर है, तू हस्ती से अपनी खुद बेखबर है’’ और श्री शाश्वत मुनि जी म.सा. ने ‘‘जिया कब तक उलझेगा संसार विकल्पों में, कितने भव बीत गये संकल्प-विकल्पों में’’ भजन की प्रस्तुति दी।
अखिल भारतवर्षीय श्वेताम्बर स्थानकवासी जैन श्रमण संघीय श्रावक समिति के वरिष्ठ उपाध्यक्ष एवं वीर नगर दिल्ली से एस.एस. जैन सभा के अध्यक्ष श्री अनिल जैन विशेष रूप से उपस्थित हुए जिनका शिवाचार्य आत्म ध्यान फाउण्डेशन के पदाधिकारियों द्वारा माला, शॉल एवं स्मृति चिन्ह द्वारा स्वागत सम्मान किया।
आज की सभा में चालीसगांव (महाराष्ट्र) संघ रूप से श्रद्धालु उपस्थित हुए, इसके अतिरिक्त नाशिक, पूना, उदयपुर से गुरुदर्शन हेतु श्रद्धालु उपस्थित हुए। श्रीमती चारू जैन एवं खुशी जैन ने ‘‘मैं तेरी शरण गुरुवर मुझको तू बचा लेना’’ एवं चालीसगांव से आए श्रद्धालुओं ने सामूहिक रूप से ‘‘गुरुवर पधारो, हृदय में विराजो मेरी प्रार्थना है’’ भजन की सुंदर प्रस्तुति दी।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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