वैराग्य से परिपूर्ण है श्री उत्तराध्ययन सूत्र |

30 OCTOBER 2024

आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव आचार्य सम्राट डॉ. शिवमुनि जी म.सा. की चार दिवसीय मौन आत्म ध्यान साधना गतिमान है। वीर निर्वाण संवत का मंगल पाठ 2 नवम्बर 2024 को प्रातः 7.30 बजे प्रदान करेंगे।

आचार्य सम्राट के सान्निध्य में श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने आज उपस्थित धर्म सभा को आत्म ध्यान का प्रयोग करवाया।

इससे पूर्व श्रमण संघीय सहमंत्री श्री शुभम मुनि जी द्वारा भगवान महावीर की अंतिम वाणी श्री उत्तराध्ययन सूत्र के 20 से 26 अध्ययन तक की मूल वांचना एवं संक्षिप्त विवेचन किया गया। जिसमें उन्होंने अनाथ और सनाथ का वर्णन में फरमाया कि ‘नाथ’ शब्द का अर्थ होता है स्वामी। मन और इन्द्रियों का दास है वह अनाथ है, नाथ वह है जिसने इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर ली मन पर विजय प्राप्त कर ली है जो सुख-दुःख से परे संयम में स्थित हो गया वह नाथ है।

उन्होंने आगे फरमाया कि समुद्रपाल का जन्म समुद्र में होता है इसलिए उनका नाम समुद्रपाल पड़ा। समुद्रपाल देखते हैं कि एक सैनिक चोर को पकड़कर वध के लिए ले जाते हैं यह दृश्य देखकर उनके मन में वैराग्य भाव जाग जाता है और वह संयम के मार्ग पर अग्रसर होते हुए उत्तम संयम पालन करते हैं। इसी तरह पशुओं की करुण चीत्कार ने अरिष्टनेमि को भोग से त्याग की ओर मोड़ दिया तो राजीमती की मधुर और विवेकपूर्ण वाणी ने रथनेमि के जीवन को पतित होने से बचा लिया।

भगवान पार्श्वनाथ परम्परा के केशी कुमार श्रमण और भगवान महावीर की परम्परा के गौतम स्वामी दोनों के प्रसंगों के उल्लेख में फरमाया कि की परंपरा का भेद हो सकता है किंतु मूल राग-द्वेष के बंधनों को काटना है। यदि संसार में उलझ रहे हैं तो उसका संसार बढ़ रहा है और यदि राग-द्वेष को काटते हैं उसका संसार कम हो रहा है।

प्रवचनमाता के उल्लेख में फरमाया कि माता का जीवन में अनूठा स्थान है। वह पुत्र को सन्मार्ग बताती है इसी तरह जैन धर्म में समिति और गुप्ति को प्रवचनमाता कहा है। सम्यक् प्रवृत्ति ‘समिति’ है और अशुभ से निवृत्ति ‘गुप्ति’ है। कोई भी प्रवृति करो तो सम्यक् पूर्वक करनी चाहिए। जो भी वस्तु है, उसे लेते एवं रखते समय जीव को कष्ट न हो। मन को हम केन्द्रीभूत करें आत्मा की ओर अग्रसर हों।

- आचार्य शिवमुनि

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