

श्रमण संघ के चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट डाॅ. शिवमुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि जो व्यक्ति हँस-हँस कर पापकर्म करता है, फिर उसका फल रो-रो कर उसे भोगना पड़ता है। यदि व्यक्ति विवेक, मर्यादा, उपयोग, ध्यान से व्यक्ति काम करे तो उसके जीवन में पाप का प्रवेश कम होता है और वह व्यर्थ के पापों से स्वयं को बचा लेता है।
उन्होंने फरमाया कि जैन धर्म में चार प्रकार के ध्यान कहे हैं- आत्र्तध्यान, रौद्रध्यान, धर्मध्यान, शुक्लध्यान। दो ध्यान अच्छे हैं, दो ध्यान बुरे हैं। धर्मध्यान अच्छा है। शुक्ल ध्यान में व्यक्ति राग-द्वेष से बहुत आगे निकल जाता है, उसमें समता आ जाती है, सहनशीलता आ जाती है। शुक्लध्यान धर्मध्यान से आगे है। कोई राग-द्वेष का कारण बन जाए, कोई कुछ कह दे, कोई आलोचना कर दे, कोई कठोर बात कह दे, कोई आक्रोशपूर्ण वचन कह दे तो भी उसके मन में कषाय उत्पन्न नहीं होते, वह अपने स्वभाव में स्थित रहता है। इसे शुक्लध्यान कहते हैं। उसमें लक्ष्य केवल आत्मा है।
उन्होंने फरमाया कि अगर आप किसी का बुरा सोचेंगे, कभी बुरा कर भी देंगे क्योंकि आपने सोच लिया है। बीज बन गया है तो कभी अंकुर भी निकलेगा। आज आप बुरा सोच रहे हैं, अभी किया नहीं है, किन्तु यदि वह बीज बन गया है और हृदय की धरती में वह पड़ गया है तो कभी न कभी उसमें से अंकुर निकलेगा। फिर कभी कर्म का वृक्ष बन जाएगा। फिर उसे कभी न कभी दुःख का फल भी लगेगा। इस प्रकार चिंतन और विचार कर्म करने का मन में बीज डाल देता है। भगवान महावीर ने कहा-मन से गलत सोचना हिंसा है। वाणी से कठोर बोलना हिंसा है। यदि आप थोड़ा भी विचार करें तो इस प्रकार की हिंसा से स्वयं को बचा सकते हैं कि इस प्रकार कठोर बोलने से और दूरगामी परिणामों पर दृष्टि न रखने से जीवन में कई प्रकार की समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं। आप उनसे तभी बच सकते हैं, जब आप अनर्थदण्ड से बचेंगे।
इससे पूर्व श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में आत्र्त रौद्र ध्यान दोनों को पुद्गल का ध्यान बताया। आत्र्त रौद्र ध्यान के कारण व्यक्ति विभाव में जाता है, विभाव के कारण कर्मों का बंधन होता हैं, इसलिए व्यक्ति को आत्र्त-रौद्र ध्यान से बचने का प्रयास करना चाहिए।
आज की सभा में शैलेज बहन जैन ने अठाई के उपवास का प्रत्याख्यान किया, जिनका शिवाचार्य आत्म ध्यान फाउण्डेशन की ओर से शाॅल, माला, स्मृति चिन्ह द्वारा स्वागत-सम्मान किया। श्री अनिल मेहता ने 23 उपवास का प्रत्याख्यान किया।
आज की सभा में कंगारू इण्डस्ट्रीज के उद्योगपति विश्व जी नीलम जी विशेष रूप से उपस्थित हुए। पाण्डेसरा (सूरत), लुधियाना, मलोट (पंजाब), संगरिया, भीलवाड़ा आदि अनेक जगहों से श्रावक-श्राविका दर्शन हेतु आये।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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