
प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी म.सा. ने सोलहवें अध्ययन की 30 गाथा, सत्तरहवें अध्ययन की 21 एवं अठारहवें अध्ययन की 54 गाथाओं का मूल वांचन किया।
श्री शमित मुनि जी म.सा. ने फरमाया कि भगवान की परमात्मा ने सभी भवी जीवों के लिए श्री उत्तराध्ययन सूत्र के माध्यम से जिसे जैन धर्म की श्रीमद् भागवत गीता कहा जाता है उसके माध्यम से भवी जीवों के कल्याण की बात कही गई है। श्री उत्तराध्ययन सूत्र एक ऐसा आगम है जिसे सम्पूर्ण आगम कह सकते हैं। जिसमें
कथाओं के माध्यम से साधु की चर्या, विनय आदि के बारे में बताया गया है।
उन्होंने कथानक में फरमाया कि मथुरा नगरी के राजा सिंहासन को छोड़कर मुनि बन जाते हैं। वे एक गावं से दूसरे गांव में विचरण करते हुए हस्तिनापुर पधारे और भिक्षा के लिए नगर की ओर जाते हैं। गांव में प्रवेश के दो रास्ते होते हैं तो मुनि ने किसी ब्राह्मण से रास्ते के बारे में पूछा। उन दो रास्तों में से एक का नाम हुताशन था, जो बहुत गर्म था ग्रीष्म-काल में उस पर कोई नहीं चल सकता था। यदि अनजान कोई उस रास्ते पर चलता तो मृत्यु हो जाती थी। दूसरा रास्ता ठण्डा था। ब्राह्मण ने गर्म रास्ते की ओर संकेत कर देता है और मुनि उसी रास्ते पर चल पड़ते हैं। मुनि के चलने से वह गर्म रास्ता ठण्डा हो जाता है। और वह ब्राह्मण भी उसी रास्ते पर पीछे-पीछे चलता है।
ब्राह्मण मार्ग को ठण्डा देखकर सोचने लगा यह सब मुनि चरणों का प्रभाव है, उसे पछतावा होता है कि मैंने जान-बूझकर झूठ बोला है। यह सोचकर वह मुनि के पास आकर अपने द्वारा पाप की आलोचना की और उनसे क्षमा-याचना की। मुनि ने उसे धर्म-उपदेश दिया, जिससे ब्राह्मण के अन्तःकरण में विरक्ति के भाव जाग उठे और वह उसी मुनि के पास दीक्षित होकर संयम और तप में तल्लीन हो गया। उन्होंने उसका नाम सोमदेव मुनि रखा।
उन्होंने आगे फरमाया कि उत्तम जाति के कुल का गर्व उसमें बना ही रहा, अपने रूप का अभिमान भी करने लगा। अंत में मरकर वह एक साधारण देव बना। कालान्तर में वह देव-भव और देवायु-पूर्ण कर जातिमद के प्रभाव एवं परिपाक से गंगा नदी के तट पर हरिकेश जाति के अधिपति बलकोष्ठ नामक चाण्डाल की पत्नी गौरी की कुक्षि से पुत्ररूप में उत्पन्न हुआ। उसका नाम बल रखा गया। आगे चल कर यही बालक हरिकेशबल के नाम से विख्यात हुआ। जन्म चाहे किसी कुल में हो कुल का महत्त्व नहीं है, महत्त्व कर्म का है कि मनुष्य का कर्म अच्छा होना चाहिए
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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