




आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. ने पर्युषण पर्व के चौथे दिन अवध संगरीला के बेंक्विट हॉल में उपस्थित धर्म सभा को संबोधित करते हुए फरमाया कि आठ दिनों के पर्युषण पर्व के दिनों में प्रतिदिन अरिहंत प्रभु की वाणी श्रवण का लाभ सभी को प्राप्त हो रहा है। मनुष्य को इस संसार सागर से पार जाने के लिए एक तड़फ, एक प्यास जगे कि मुझे इस ससंार सागर से पार होना है।
आचार्य भगवन ने गजसुकुमाल के प्रसंग में फरमाया कि गजसुकुमाल मुनि बन जाते हैं तो भी उनके पुराने निकाचित कर्म उदय में आते हैं जब गजसुकुमाल गहरे ध्यान में होते है तो सोमिल ब्राह्मण उनके मुण्डित सिर पर धधकती आग के अंगारों को सिर पर डाल देता हैं किंतु गजसुकुमाल जड़ जीव का भेद करते हुए 48 मिनिट तक स्थिर रहते है। इस दृष्टांत में एक मोक्ष को प्राप्त करते हैं तो दूसरा भारी कर्मों का बंधन करता है।
आचार्य भगवन ने मोह को शत्रु बताते हुए फरमाया कि जब मोह होता है तो मन वश में नहीं होता है। मोह को कम करने के लिए इस शरीर को पराया मानो तब मोह टूटेगा, शरीर की पांचों इन्द्रियां व शरीर और आत्मा का भेद करोे कि जब यह शरीर तुम्हारा नहीं है तो यह परिवार, रिश्ते, मित्र तुम्हारे कैसे हो सकते हैं, इस भावना से मोह टूटता है। कोई भी व्यक्ति दिखे तो उसके शरीर, आकार को नहीं अपितु उसके भीतर आत्मा को देखें। भगवान की वाणी में हर बार कहा जाता है कि हे आत्मन््! यानि भगवान केवल आत्मा को महत्त्व देते हैं।
आस्था का उल्लेख करते हुए आचार्य भगवन ने फरमाया कि व्यवहार में देव, गुरु और धर्म पर आस्था दृढ़ होनी चाहिए और निश्चय में अपने स्वरूप में रमण करना, अपने में स्थित हो जाना ही धर्म की ओर अग्रसर होने का मार्ग है। मन नहीं लगना, तनाव रहना ये सब अधर्म के लक्षण हैं।
युवामनिषी श्री शुभम मुनि जी म.सा. ने आज सूत्र के विवेचन गजसुकुमाल के जन्म, दीक्षा से मुक्ति तक का रोचक वर्णन सुनाया।
धर्म सभा के प्रारंभ में प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी ने श्री अंतकृतदशांग सूत्र का मूल वांचन किया।
आत्म भवन में प्रात 7.00 बजे वीतराग साधिका निशाजी ने शुक्ल ध्यान के प्रयोग के द्वारा अरिहंत प्रभु की वाणी में जड़ जीव को एक मानना कर्म बंधन का कारण बताया।
कामरेज से श्रीमती डीम्पल मारु ने 23 उपवास का प्रत्याख्यान लिया, तपस्वी का शिवाचार्य आत्म ध्यान फाउण्डेशन की ओर से सम्मान किया गया। बैंगलोर से सरलाजी गोलछा ने चार दिन के उपवास का प्रत्याख्यान लिया। इसके अतिरिक्त प्रत्यक्ष एवं ऑनलाईन के माध्यम से धारणा के अनुसार उपवास, एकासन, आयंबिल आदि तपस्याओं के प्रत्याख्यान लिये।
पर्युषण पर्व के कार्यक्रम का सीधा प्रसारण जैनाचार्यजी यू-ट्यूब चैनल पर किया जा रहा है।
आज की प्रभावना श्री जवाहरलाल माण्डोत एवं श्री सुरेश जी संचेती की तरफ से थी।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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