धन का सद्उपयोग कर पुण्यार्थ में लगाए |

31 July 2024

‘‘मनुष्य को उसके कर्मों के अनुसार नरक गति, तिर्यंच गति, मनुष्य गति व देवगति प्राप्त होती है। अत्यधिक पाप कर्म करने वाला नारकीय जीवन भोगता है। जीव अपने पाप कर्मों के अनुसार उस अंधकारमय कुंभी जो उपर से संकरी व नीचे से चैड़ी होता है, उसमें वह उत्पन्न होता है, जहां से उस जीव का निकलना बड़ा कठिन होता है, परमाधर्मी उस जीव को खींच-खींच कर बाहर निकालते हैं।’’ उपरोक्त विचार श्रमण संघ के चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट डाॅ. शिव मुनि जी ने आत्म भवन में उपस्थित धर्म सभा को संबोधित करते हुए फरमाया।

उन्होंने नरक गति के कारणों की चर्चा करते हुए फरमाया कि नरक गति में जाने का पहला कारण है-महारम्भ। एक गृहस्थ को अपनी गृहस्थी चलाने के लिए काम-धंधा करना पड़ता है, किन्तु एक श्रावक को ऐसा व्यवसाय नहीं करना चाहिए, जिसमें विशेष हिंसा हो। जैसे कोयला प्राप्त करने के लिए वन में आग लगाकर वृक्षों को जला देना। वन में आग लगाने से असंख्य जीवों की हिंसा होती है। नरकगति में जाने का दूसरा कारण है-महापरिग्रह। धन, दौलत से अधिक मोह। आसक्ति अधिक होगी तो अन्याय, अनीति करेगा। यदि मोह नहीं होगा तो न्याय से धन कमाएगा। धन के लिए अपनी मर्यादा, नियम, न्याय, सत्यमार्ग, धर्ममार्ग को छोड़ेगा नहीं। जो लोग इस प्रकार धन दौलत से अत्यधिक ममत्व रखते हैं ऐसे लोग परिग्रह की ममता के कारण अन्याय-अनीति करके और अनेक प्रकार की हिंसाएं करके नरक में चले जाते हैं। नरक में जाने के अन्य दो कारण हैं-पंचेन्द्रिय वध और मांसाहार। अपने शरीर के पोषण के लिए किसी जीव की हिंसा करना यह नरक गति में ले जाने वाला होता है और मांसाहार करना भी नरक गति की ओर ले जाता है, इसलिए व्यक्ति ऐसा पाप नहीं करना जिससे नरक गति में जाना पड़े।

शिवाचार्य श्री जी ने आगामी 5 अगस्त 2024 को राष्ट्रसंत आचार्य सम्राट पूज्य आनन्द ऋषि जी की 125वीं जयंति के उपलक्ष में देशभर में विराजित श्रमण संघीय साधु-साध्वी, श्रावक श्राविकाओं को आयंबिल तप करने की प्रेरणा दी। उन्होंने फरमाया कि परम पूज्य आचार्य सम्राट आनन्द ऋषि जी को आयंबिल तप में रूचि थी वे स्वयं आयंबिल तप करते रहे, 125वीं जन्म जयंति पर एक लाख पच्चीस हजार आयंबिल तप का उन्होंने आह्वान किया।

इससे पूर्व श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी ने अपने उद्बोधन में कहा कि संसार अनादिकाल से चल रहा है ससंार से पार जाना है केवल एक द्रव्य को जीना है वह है जीवास्तिकाय जिसमें अपना स्वयं का जीव हो। इस संसार में करोड़ों जीव है किंतु वे जीव और पुद्गल साथ रहते हैं किंतु साथ रहते हुए एक दूसरे के नहीं हो सकतेे इसलिए मनुष्य अपने स्वभाव में जीने का प्रयास करे जिससे वह अपना आत्म कल्याण कर सकता है

- आचार्य शिवमुनि

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