आचार्य सम्राट डॉ. शिवमुनि जी म.सा. ने रक्षा बंधन के पावन पर्व पर अपने उद्बोधन में फरमाया कि रक्षा बंधन का पावन दिवस भाई-बहन का अटूट रिश्ते का पर्व होता है। यह भारत के अलावा अन्यत्र दूसरी जगह नहीं है। बहन भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र एवं मस्तक पर तिलक लगाकर दीर्घायु की कामना करती है और भाई बहन को रक्षा का वचन देता है। भारत के इतिहास में रक्षा बंधन की अनेक घटनाएं हैं।
उन्होंने चित्तौड़ की रानी कर्मावती व मुगल बादशाह हुमायूं की घटना का उल्लेख करते हुए फरमाया कि चित्तौड़ की रानी कर्मावती ने गुजरात के बहादुर शाह की सेनाओं का अपने विरुद्ध लड़ाई के लिए कूच करने पर अपनी सुरक्षा के लिए मुगल बादशाह हुमायूं को एक मखमली डिब्बे में 21 रत्नों से जड़ी राखी भेजी। उस राखी का मान रखते हुए हुमायूं ने रानी कर्मावती की रक्षा की। कर्मावती की राखी बहुत दिनों तक आगरा के किले में शाही ताले में सुरक्षित रखी गई जिसे बाद में बेगम नूरजहां ने यही राखी शाहजहां को भेजी।
उन्होंने स्वामी विवेकानन्द द्वारा ब्रदर एण्ड सिस्टर के संबोधन से जुडे़ प्रसंग पर फरमाया कि अमेरिकावासी लेडीज एण्ड जेन्टलमैन का संबोधन ही सुनते आ रहे थे। पहली बार उन्होंने स्वामी विवेकानन्द द्वारा अपने लिए बहनों और भाईयों का संबोधन सुना तो वे बहुत प्रसन्न हुए और सारा सभाभवन तालियों की ध्वनि से गूंज उठा। इस भाई और बहन के रिश्ते व महत्त्व को विश्व अनेक देशों ने भी जाना और समझा।
उन्होंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रसंग में फरमाया कि रक्षा बंधन के दिन काशी महाराज के दरबार में पण्डित मदन मोहन मालवीय राखी बांधने पहुंचे तो महाराज प्रसन्न हो उठे। उन्होंने अपने सिंहासन से उठकर पंडित मालवीय से राखी बंधवाई तो दक्षिणा के रूप में मालवीय ने कहा, मुझे गंगा किनारे विश्वविद्यालय के लिए जमीन चाहिए। काशी नरेश ने 15 गांवों के बराबर जमीन और धन दिया। राखी के इस रेशमी धागे में वह शक्ति है जिससे हर आपत्ति से बाहर आ सकते हैं। रक्षासूत्र सम्मान और आस्था प्रकट करने के लिए भी बांधा जाता है। यह त्योहार परिवार, समाज, देश और विश्व के प्रति अपने कर्तव्य बोध की ओर परिलक्षित करता है।
प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि आचार्य या गुरु को अप्रसन्न नहीं करना चाहिए। शिष्य के लिए गुरु की आशातना को मुक्ति के मार्ग में बाधक बताया।
युवा मनीषी श्री शुभम मुनि जी म.सा. ने ‘‘रक्षा बंधन पर्व सलूनो, सबका है रखवारा त्यौहार है प्यारा’’ सुमधुर भजन की प्रस्तुति दी।
प्रत्यक्ष एवं ऑनलाईन के माध्यम से अपनी धारणाओं के अनुसार तपस्वियों ने उपवास, एकासन, आयंबिल आदि तपस्याओं का प्रत्याख्यान लिया।
आज की धर्म सभा में दिल्ली, जम्मू आदि क्षेत्रों से श्रद्धालुगण उपस्थित हुए।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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