



आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव आचार्य सम्राट पूज्य डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में समाधि तंत्र की चर्चा करते हुए फरमाया जिसकी दृष्टि शरीर पर है, पदार्थ पर है, भोगविलास पर हैं, अपने परिवार पर है वह बहिरात्मा है, उसकी दृष्टि केवल शरीर पर रहती है। जो अपने भीतर आकार में निराकार अष्टगुणों से युक्त आत्मा पर श्रद्धा करता है। जो भीतर की ओर जाने का पुरुषार्थ करता है और आत्मा की वस्तुस्थिति को समझता है वह अंतरात्मा है।
आचार्य भगवन ने आगे फरमाया कि व्यक्ति के पास जब धन आ जाता है तो वह अच्छा मकान बना लेता है, बाहर घूमने चला जाता है, वह चार्वाक के सिद्धांत के अनुसार चलता है। चार्वाक का सिद्धांत है खाओ पीओ और मौज मनाओ। कर्ज लेकर घी पीओ। वह शरीर को ही आत्मा मानता है, तर्क करता है कि आत्मा किसने देखी है वह बर्हिमुखी होता है।
आचार्य भगवन ने आगे फरमाया कि कर्म मोह से उत्पन्न होता है। मोह के कारण किसी से राग है तो किसी से द्वेष है, इस मोह को तोड़ने के लिए अंतर्मुखी होना चाहिए। अंतर्मुखी से परमात्मा बन सकता है। परमात्मा वह है जो सिद्धशिला में विराजमान है, वह केवल सिद्ध आत्मा होती है। सिद्ध भगवन को कोई कर्म मल नहीं लगता है, इसलिए हर साधक का लक्ष्य सिद्धालय का होना चाहिए। जैसे कीचड़ में कमल, म्यान में तलवार, फूल में सुंगध है वैसे ही आत्मा में परमात्मा है। हम आत्मा का चिंतन करें, आत्मा का बोध प्राप्त करें। आत्मा बाहर के संसार से भीतर चली जाती है तो उसे कोई कष्ट नहीं होता है।
प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने तत्वार्थ सूत्र के बंध प्रकरण में फरमाया कि ज्ञानावरण के पांच भेद है। मति ज्ञानावरण, श्रुत ज्ञानावरण, अविधिज्ञानावरण, मनःपर्यव ज्ञानावरण और केवल ज्ञानावरण। ज्ञानावरण पांच भेदों से प्रवर्तित है। ज्ञानावरण कर्म पाप कर्म बंध के कारण होता है जैसे कोई अंधा व्यक्ति है, अंधे की आंखें नहीं होते हैं ऐसे हमारे ज्ञान गुण को आवरण कर दिया जाता है और जिसके पास ज्ञान नहीं है वही व्यक्ति चार गति चौरासी लाख जीवायोनि में भ्रमण कर रहा है।
जिस तरह से गोलाकार मकान में चौरासी बंद दरवाजे हैं, जिसमें बाहर निकलने का एक ही दरवाजा खुला हुआ है और आंखों पर पट्टी बांधी हुई है। हाथ घुमाते-घुमाते निकलता है जब खुला दरवाजा आता है उस समय खुजली आ जाती है फिर घुमता रहता है और उसे रास्ता नहीं मिलता है। ऐसे अनादिकाल से हम अंधे है ज्ञानावरण के कारण अंधे हैं। अज्ञान के कारण चार गति चौरासी लाख जीवायोनि में भ्रमण कर रहे हैं।
श्री निशांत मुनि जी म. सा. ने ‘‘जगत में चिंता मिटी उसी की, जो तेरे चरणों में आ गए हैं’’ भजन के द्वारा अपनी भावनाएं व्यक्त की।
ऑनलाईन के माध्यम से तपस्या करने वाले तपस्वियों ने उपवास, एकासन, आयंबिल का प्रत्याख्यान लिया।
उपप्रवर्तिनी महासाध्वी श्री करुणा जी म.सा. की वैरागन तृप्ति जैन एवं सिरसा से श्री संदीप जैन परिवार सहित आचार्य श्री जी के दर्शन हेतु उपस्थित हुए,
जिनका शिवाचार्य आत्म ध्यान फाउण्डेशन की ओर से स्वागत सम्मान किया गया।
आत्म भवन में प्रतिदिन प्रातः 6.15 से 7.15 आत्म ध्यान, प्रातः 9.30 से 10.30 स्वाध्याय, ध्यान एवं मंगल पाठ होगा। आप सभी लाभ लेकर अपन जीवन कृतार्थ करें।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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