


श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. के सान्निध्य में आज शनिवार से एक दिवसीय, चार दिवसीय एवं दस दिवसीय आत्म ध्यान धर्म यज्ञ का शुभारम्भ हुआ। यह धर्म यज्ञ नाशिक ध्यान केन्द्र, आदीश्वर धाम कुप्पकलां (पंजाब), अम्बाला एवं जम्मू शहर में ऑनलाईन के माध्यम से किया जा रहा है।
आत्म ध्यान धर्म यज्ञ के प्रथम दिन आचार्य भगवन ने ध्यान का प्रयोग करवाते हुए फरमाया कि जीव अनादि काल से यात्रा कर रहा है। अपने भीतर केवल ज्ञान, केवल दर्शन को प्रकटाने हेतु जीव तत्व में स्वयं को स्थित करंे। अपने आपको देखते हुए पुद्गल के पार जाकर यहीं ठहर जाएं। ध्यान के लिए मन का मौन आवश्यक है। मन के साथ जुड़ने से कार्मण काया का विस्तार हुआ है, इसलिए मन के पार जाना है। आंख बंद रखते हुए क्या हुआ क्या होगा इसे छोड़कर अपने आप में स्थित हो जाएं।
उन्होंने आगे ध्यान के प्रयोग में फरमाया कि ध्यान में क्रिया-प्रतिक्रिया नहीं करना। अपने स्वरूप में बने रहना। आप आत्मा हैं यहीं स्थिर रहें। दो तत्व साथ हैं जड़ और जीव, जीव की यात्रा का एक पड़ाव है जड़। जो स्वयं को देह मानता है वह अपनी यात्रा का विस्तार कर रहा है। देह के पार जाकर जीव अपने आपको भिन्न मानकर, कर्म क्षय करता हुआ वीतराग पथ पर आगे बढ़ता है। देह मैं नहीं हूं देह मेरा नहीं। देह में मैं एक निवासी हूं। अपने को भिन्न जानें और स्वरूप में उतरने का प्रयास करें। जैसे देह स्वयं की नहीं है वैसे मन भी स्वयं का नहीं है। आते-जाते श्वांस को देखें, श्वांस को महत्त्व देंगे तो विचार अपने आप शांत हो जाएंगे।
श्रमण संघीय प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने उद्बोधन में फरमाया कि मैं कौन हूं इसे जानने के लिए विनय एवं भेद विज्ञान के साथ साधना की शुरूआत होती है। जीव अनादिकाल से यात्रा कर रहा है, यात्रा करते हुए चार गति चौरासी लाख जीवायोनि में घूम रहे हैं। चिंताओं से मुक्त होने के लिए, अपने स्वरूप का परिचय प्राप्त करने के लिए आत्म ध्यान है। अपने व्यक्तित्व का जो बाह्य परिचय है वह मिथ्यात्व है। शरीर के भीतर आत्मा के अस्तित्व के स्वरूप का भान नहीं होने के व्यक्तित्व का ध्यान किया, व्यक्तित्व का चिंतन किया जिसके कारण कार्मण शरीर पर कर्म बढ़ते गए, उन कर्मों को निर्जरित करने के लिए आत्म ध्यान ही श्रेष्ठ विधि है।
इससे पूर्व युवा मनीषी श्री शुभम मुनि जी ने शिविर के प्रारंभ में प्रार्थना ध्यान का प्रयोग करवाया।
आज की सभा में जम्मू से श्रीमती आशा, अशोक जी जैन परिवार, पूना से श्री प्रशान्त गांधी परिवार सहित गुरु दर्शन हेतु उपस्थित हुए। इसके अलावा नाशिक, ठाणा (मुंबई), बैंगलोर से भी श्रद्धालु दर्शनार्थ उपस्थित हुए।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
WhatsApp us
