मोक्षगामी असंयम की इच्छा नहीं करता |

- आचार्य शिवमुनि

31 OCTOBER 2025

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. के सान्निध्य में आयोजित ऑनलाईन आत्म ध्यान धर्म यज्ञ के सातवें दिन आचार्य भगवन ने आत्म ध्यान का प्रयोग करवाया।

इससे पूर्व प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने श्री आचारांग सूत्र का विवेचन करते हुए फरमाया कि जो शिष्य आत्मार्थी है, धु्रवचारी है, मोक्ष मार्ग में आगे बढ़ रहा है वह असयंमी जीवन की इच्छा नहीं करता।

असंयमी और संयमी जीवन के विवेचन में आगे फरमाया कि संयमी जीव धुव्र की, मुक्ति की आराधना करता है और सत्य को प्राप्त करने के लिए अपनी देह, मन, बुद्धि, इन्द्रियों को नियंत्रण में रखता है। कर्म निर्जरा के लिए देह, मन, बुद्धि का उपयोग करता है, न कि मन, बुद्धि इन्द्रियों को खुला छोड़कर कर्म आश्रव करके अपनी आत्मा पर कर्म चढ़ाता है। असंयमी व्यक्ति की दिशा अधु्रव की होती है और संयमी की दिशा धु्रव की होती है। धु्रव शाश्वत है जबकि अधु्रव अशाश्व है। प्रति क्षण बदलने वाले अशाश्वत में जो सुख ढूंढता है वह अज्ञानी है। जिस व्यक्ति की श्रद्धा धु्रव के प्रति होती है, जो धु्रव की ओर गति करता है, उसके भीतर स्थिरता, धैर्य बना रहता है। आत्म ध्यान धर्म यज्ञ में साधको को जीव को जीव में स्थिर करने और स्थिरता बढ़ाने की विधि सिखाई जाती है।

उन्होंने आगे फरमाया कि पांच समिति, तीन गुप्ति की साधना जिसमें मन, वचन, काया का गोपन किया जाता है उससे जीवन में स्थिरता आती है। स्थिर मन भेद विज्ञान की साधना में सहायक है और भेद विज्ञान की साधना से मोक्ष की ओर आगे बढ़ सकते हैं। धु्रवता धर्म है और धर्म स्वभाव है। धु्रवता का आचरण करने वाला धु्रवचारी है।

पर्याय गति का पड़ाव है, जो नरक, तीर्यंच, मनुष्य है, वह पर्याय परिवर्तनशील है। पर्याय उदय कर्म के अधिन बदलते रहते है। शुद्ध द्रव्य तीनों काल में एक समान रहता है, वह बदलता नहीं हैं वही हमारी आत्मा है जो अटल सत्य है।

मधुर गायक श्री निशांत मुनि जी म.सा. ने ‘‘सिद्ध भगवान को हमारी वंदना, हमारी वंदना है हमारी वंदना’’ भजन की प्रस्तुति देते हुए अपने उद्बोधन में लौकिक व आध्यामिक वंदना का महत्त्व बताया।

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