
प्रमुखमंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में श्री उत्तराध्ययन सूत्र की व्याख्या करते हुए अकाम मरणीय अध्ययन का विवेचन करते हुए फरमाया कि जिस व्यक्ति की आसक्ति काम भोगों में है और वह इस चकाचौंध भरे वातावरण में मृत्यु को भूल गया है, इच्छा नहीं होेते हुए भी आयुष्य पूर्ण होने पर मरना पड़ता है वह अकाम मरण है। उसी प्रकार जिसकी आसक्ति काम भोगों से शांत नहीं हुई, धर्म व्यवहार में बोध नहीं है, अज्ञान वश काम, क्रोध, मान, माया, लोभ आदि कषायों से अभिभूत रहते हुए मर जाता है उसे बाल मरण कहा गया है।
उन्होंने आगे फरमाया कि सकाम मरण वह है जिसमें व्यक्ति धर्म परिणति में प्रवेश करके पांच महाव्रतों की आराधना करता है। आत्मा या परमात्म तत्व में लीन होकर मृत्यु का स्वागत करता है वह सकाम मरण है। इसी तरह पण्डित मरण में मृत्यु के निकट समय में व्यक्ति कषाय से मुक्त होकर मरता है। ज्ञान, दर्शन, चारित्र की उत्कृष्टता से संथारे के साथ मृत्यु आती है तो वह पण्डित मरण है।
उन्होंने यह भी फरमाया कि जन्म और मृत्यु ये जीवन के दो किनारे हैं। जीवन जीना एक कला है तो मरना भी एक कला है। जीवन जीने की कला तो सभी सिखाते हैं, किंतु जैन दर्शन में मृत्यु की कला का भी विधान है, जिसमें मृत्यु के अंतिम समय में किस तरह से इस नश्वर शरीर का त्याग किया जाता है।
प्रमुख मंत्री श्री जी ने शिक्षा पद्धति में सुविद्या की आवश्यकता पर बल देते हुए फरमाया कि वर्तमान में केवल शब्दों का ज्ञान बढ़ा है, किंतु धर्म के संस्कारों का ह्रास हुआ है। पहले गुरुकुलों में धर्म के संस्कार दिये जाते है, जीवन जीने की कला सीखाई जाती थी। वर्तमान में ‘साविद्या या विमुक्तये’ गोण हो गई। जो मूल विद्या थी वह पाठ्यक्रम से हट गई इसलिए सब दुःखी हैं। भारत सरकार द्वारा इस ओर प्रयास करना चाहिए और किया भी जा रहा है जिससे विरासत और संस्कृति का विकास होगा। पहले के समय में माता-पिता के लिए वृद्धाश्रम नहीं होते थे, क्योंकि संयुक्त परिवार होता था, परिवारों में संस्कार थे, सेवा की भावना होती थी। अभी लोभ और अज्ञान के कारण वर्तमान पीढ़ी संस्कारहीन होती जा रही है। प्रलोभन में अनाथ आश्रम बन रहे हैं, अंग्रेजो ने देश व संस्कारों की नीति को तोड़कर मानसिक रूप से गुलाम बना दिया है। भारतीय संस्कृति को बचाने के लिए सुविद्या आवश्यक है जिससे बच्चों में भारतीय संस्कृति के विचार पुष्ट हो।
उन्होंने यह भी फरमाया कि जो साधु पांचों इन्द्रियों में आसक्त नहीं होते हैं, जो संयम, व आत्मा की साधना करते हैं, इन्द्रियों के वशीभूत न होकर अपनी साधना करते हैं। उनका जीवन वर्तमान में अच्छा होता है और आगे की गति भी अच्छी होती है।
इससे पूर्व प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी म.सा. ने श्री उत्तराध्ययन सूत्र की महत्ता भजन के माध्यम से प्रस्तुत की एवं ध्यान का प्रयोग करवाया।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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