भगवत्ता को प्राप्त करने की शक्ति है मानव में |

2 AUGUST 2024

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट डॉ. शिव मुनि जी म.सा. ने आत्म भवन में उपस्थित धर्म सभा को जैन धर्म के अनुसार मनुष्य की उत्पत्ति के स्थान की चर्चा करते हुए फरमाया कि अढ़ाई द्वीप में मनुष्य रहते हैं, जिसमें जम्बूद्वीप, धातकीखण्ड और अर्धपुष्कर द्वीप आते हैं। मनुष्य इस अढ़ाई द्वीप में कहीं भी उत्पन्न हो सकता है – कभी कर्मभूमि में, कभी अकर्मभूमि में, कभी अन्तरद्वीप में। अकर्मभूमि में कर्म नहीं होता, किन्तु वहां धर्म भी नहीं होता; कोई मंत्र जाप, आराधना, मंदिर, पूजा नहीं होती, न ही उस भूमि में साधु, साध्वी, श्रावक, श्राविकाएं होते हैं। कल्पवृक्षों से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

उन्होंने आगे फरमाया कि कर्म के साथ धर्म का सम्बन्ध है, व्यक्ति को धर्म करने के लिए कर्मभूमि में आना पड़ता है। भगवत्ता को प्राप्त करने की शक्ति मानव में है; वह इस कर्मभूमि में पुरुषार्थ के द्वारा मोक्ष प्राप्त कर सकता है। पुरुषार्थ से व्यक्ति कर्म काट सकता है।

मनुष्य जन्म प्राप्ति के चार कारण बताते हुए फरमाया कि जो मनुष्य दयालु है, सरल है, नम्र है और जो ईर्ष्या नहीं करता, इन चार गुणों से मनुष्य को कर्मभूमि में जन्म मिलता है, क्योंकि अन्तरद्वीपज, अकर्मभूमिज और सम्मूच्र्छिम जीव बनकर मनुष्य का कल्याण नहीं हो सकता, वह केवल कर्मों को भोगने की एक अवस्था मात्र है। पहला है दयालुता। दूसरा है सरलता, अर्थात मन, वाणी और कर्म की एकरूपता – जैसा मन में सोचा, वही बोलते हैं; जैसा बोलते हैं, वैसा ही करते हैं। जिस व्यक्ति में नम्रता होती है, वह दूसरे के मन को जीत लेता है। जैसे पानी ढलान की ओर जाता है, इसी प्रकार ज्ञान सदैव नम्र व्यक्ति की ओर जाता है। अहंकारी के पास ज्ञान नहीं ठहरता। ऊंचे टीले पर पानी नहीं ठहरता। नम्र व्यक्ति में अहंकार, क्रोध नहीं आता। वह कभी गलत कार्य नहीं करता, कभी किसी की बुराई नहीं करता। निंदा चुगली नहीं करता। वह स्वयं में सन्तुष्ट, स्वस्थ विचारों वाला बनकर रहता है। उसका बाहर के जगत से इतना सम्बन्ध नहीं रहता। वह समझता है कि हम अपनी दुनिया में मस्त हैं। हमें दूसरों से क्या? जो करेगा, सो भरेगा। हमें किसी की आलोचना करने की आवश्यकता नहीं है। जो व्यक्ति उसके जीवन में आता है, उसके साथ वह विनय और नम्रता का व्यवहार करता है। ऐसा व्यक्ति शुभ कर्मों का उपार्जन करके ऐसे कर्मों का बंध कर लेता है, जिसके फलस्वरूप उसे मनुष्य गति की प्राप्ति होती है।

व्यक्ति सरल भी हो, नम्र भी हो, दयालु भी हो, यदि तीन दिशाओं में आपका पुरुषार्थ चलता है तो वह पण्डित पुरुषार्थ है। ऐसा व्यक्ति मोक्ष और धर्म की दिशा में पुरुषार्थ करके कर्मभूमि में पुनः मनुष्य बन जाता है। वहां श्रावक और साधु बनकर, चारित्र धारण करके आत्म-विकास करता हुआ वह मोक्ष को प्राप्त कर सकता है।

मंत्री श्री शिरीष मुनि जी ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि मनुष्य में हर परिस्थिति का सामना करने का सामर्थ्य है किंतु उसे पुदगलों को ठीक करने का सामर्थ्य नहीं है। जीव आत्मा की विभिन्न परिस्थिति का ज्ञान नहीं है तो वह एक तरह का अज्ञान ही है। जीव के स्वरूप को नहीं समझने के कारण अनेक जीवायोनियों में भटकना पड़ता है, इसलिए मनुष्य अपना सामर्थ्य अपनी आत्मा को जानने की ओर लगाए तो कल्याण हो सकेगा।

इससे पूर्व युवा मनीषि श्री शुभम मुनि जी म.सा. ने “पाया नर तन पाया, क्या पाकर लाभ कमाया” भजन की प्रस्तुति दी।

इस अवसर पर पुणे, जयसिंहपुर, अहमदाबाद, तिरूवन्नामलै, बैंगलोर आदि अनेक जगहों से गुरु भक्तों का आगमन हुआ। बाहर से आए हुए अतिथियों का शिवाचार्य आत्म ध्यान फाउंडेशन की ओर से श्री तुलसी भाई चपलोत ने आभार ज्ञापित किया।

- आचार्य शिवमुनि

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