


प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने उपस्थित श्रद्धालुओं को ध्यान का प्रयोग करवाया एवं आचार्य भगवन के स्वास्थ्य सुधार की जानकारी प्रदान की।
युवा मनीषी श्री शुभम मुनि जी एवं प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी ने बीसवें अध्ययन महानिर्ग्रन्थीय की 60 एवं इक्कीसवें अध्ययन समुद्रपालीय की 24 गाथा का मूल वांचन किया।
श्री शुभम मुनि जी म.सा. ने ‘‘जो करता आत्मा का ध्यान, वह भिक्षु है, वह भिक्षु है’’ भजन की प्रस्तुति के साथ फरमाया कि परमात्मा की अंतिम वाणी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करती है।
उन्होंने भिक्षु और भिक्षाक का विवेचन करते हुए फरमाया कि जो साधु भिक्षाचरी से अपनी तप साधना करता है वह भिक्षु होता है, जो किसी भी घर में भोजन के लिए जा सकते हैं, किंतु जो अपने शरीर के पोषण के लिए भोजन लेता है वह बिना अनुमति के घर में प्रवेश नहीं कर सकता। साधु के पास इतना सामर्थ्य होता है कि वह भोजन के लिए सीधे घर में प्रवेश कर सकते हैं। साधु संयमी है, त्यागी है, तपस्वी है, आत्मा ध्यान करते हैं। भिक्षाक सीधा घर में प्रवेश न करते हुए द्वार पर खड़े होकर ही भोजन की याचना करता है।
उन्होंने दो मुंह वाले भारण्ड पक्षी का उदाहरण देते हुए फरमाया कि भारण्ड पक्षी एक मुंह से भोजन ग्रहण करता है और दूसरे मंुंह से निगरानी रखता है कि कोई दूसरा पक्षी या जानवर मुझे हानि न पहुंचा दे, यदि वह स्वाद लोलुप्ता के कारण दोनों मुंह से भोजन करता है तो दूसरा जानवर उसे पकड़ लेता है और उसे बंधक बना लेता है, इसी प्रकार जो साधु साधना करते हुए किसी प्रलोभन में न आकर भारण्ड पक्षी की तरह बंधक नहीं बनता है।
उन्होंने यह भी फरमाया कि जो साधु है उसकी साधुता का सम्मान करते हुए उसे भाव से वंदन करने से कर्म निर्जरा होती है, यदि कोई संत मिले जो उन्हें भावपूर्ण वंदना करनी चाहिए।
प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी म.सा. ने आज पन्द्रहवा अध्ययन सभिक्षु का विवेचन में फरमाया कि परमात्मा प्रभु महावीर ने फरमाया कि साधु का आचरण ही बोलता है, साधु सहज व सरल होते हैं। साधु असंयम से निवृत होते हैं। राग-द्वेष रहित होकर दीक्षा के बाद अपने माता-पिता, भाई बहनों को छोड़ देते हैं। संसार के सगे सम्बंधियों का त्याग कर देता है। सभी प्राणियों को अपने समान समझते हुए किसी के प्रति आसक्ति नहीं होता। परिषहों को सहन करने वाले होते हैं। जीवन में कष्टों को सहन करते हैं। बाइस परिषहों को जीतने वाला सहन करने वाला भिक्षु कहलाता है। साधु बनने के बाद नाम की लालसा नहीं रहती। नाम ख्याति की आकांक्षा नहीं होती, सत्कार और पूजा, वंदना की इच्छा नहीं रखता। जो संयत है आत्मा की गवेष्णा करता है वह भिक्षु कहलाता है। उन्होंने 16वें अध्ययन ब्रह्मचर्य समाधि स्थान का विवेचन करते हुए फरमाया कि साधु को व्यवहारिक दृष्टि से ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। सभी तपों में ब्रह्मचर्य उत्तम तप है। ब्रह्मचर्य की रक्षा के लिए नौ नियम बतलाये गये हैं जिनका पालन करते हुए व्यक्ति ब्रह्मचर्य की आराधना कर सकता है। जो ब्रह्मचर्य की आराधना करता है उसे देवता भी नमस्कार करते हैं।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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