
श्रमण संघ के चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट डॉ. शिवमुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में साधु-साध्वी, श्रावक-श्राविका चारों को तीर्थ के समान बताते हुए फरमाया कि साधु पांच महाव्रत धारण करता है और श्रावक बारह व्रत को स्वीकार करता है। भगवान महावीर की दृष्टि से जो सच्चा श्रावक होता है उसे बाहर व्रत धारण करना चाहिए। व्रत में सहज उत्साह, उल्लास का भाव होना चाहिए, जो व्रत को स्वीकार करते हैं वे महावीर के तीर्थ में हैं।
उन्होंने फरमाया कि ध्यान, सामायिक करते समय बच्चों को भी पास में बिठाना चाहिए, छोटे बच्चों को उसकी उम्र के अनुसार जितनी उम्र है उतने ही मिनिट का ध्यान का अभ्यास करवाना चाहिए साथ ही अच्छे कार्य में बच्चों को सम्मिलित करने से बच्चों में अच्छे संस्कारों का निर्माण होता है।
उन्होंने माता-पिता, गुरु और अतिथि का सम्मान और आदर का भाव रखने की चर्चा करते हुए फरमाया कि मां पहला गुरु होती है, माता को रत्नकुक्षी कहा जाता है, मां तीर्थंकरों को जन्म देती है। भारतीय परंपरा में 72 कलाएं पुरुषों की है और 64 कलाएं स्त्री की है, जिसमें गर्भ धारण की कला का भी उल्लेख मिलता है। सति मदालसा ने अपने सातों पुत्रों को गर्भ में संस्कार दिए कि तुम शुद्ध हो, बुद्ध हो, निरंजन हो, संसारी माया को छोड़ो और सातों पुत्रों को सन्यासी बना दिया।
बारहवां अतिथिसंविभाग व्रत की चर्चा करते हुए फरमाया कि इस व्रत का पालन करने से श्रावक के आत्मविकास के सक्रिय रूप का यथार्थ अनुमान लग जाता है कि उसने चित्त में उदारता को कितना स्थान दिया है? उसकी आत्मा ‘आत्मवत् सर्व-भूतेषु’ के मंत्र को जीवन में कितना पचा सकी है? विश्वबन्धुत्व की भावना का साकार रूप वृक्ष जब परिपुष्ट हो जाते हैं, तब वे किसी से कुछ माँगते नहीं, वे हर घड़ी देते ही रहते हैं। गाय के स्तनों में जरा भी दूध जमा हो जाता है तो वह उसे देने के लिए जोर से रम्भाने लगती है।
उन्होंने फरमाया कि उत्तरोत्तर व्रतग्रहण से जैसे-जैसे मनुष्य का आध्यात्मिक स्तर ऊँचा उठता जाता है, वैसे-वैसे वह ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की दृष्टि और भावना से इस पृथ्वी को अधिकाधिक नम्र, संयत और सुसंस्कृत बनाने के लिए अपना सर्वस्व देने को तत्पर रहता है। तीर्थंकर भगवान बारह महीनों तक लगातार उदार और मुक्त दान का प्रवाह बहाते हैं।
इससे पूर्व श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने तत्वार्थ सूत्र के माध्यम से फरमाया कि संसार का कारण आश्रव है, क्रिया भी एक आश्रव है, क्रिया से मुक्ति नहीं मिल सकती। केवलज्ञान में मोह कर्म बाधक है, सबसे ज्यादा काया का मोह है। 48 मिनट की सामायिक में समभाव रहकर शुक्ल ध्यान के प्रयोग से आत्मा में स्थित रहकर कर्मों को क्षय किया जा सकता है।
प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी म.सा. ने ‘‘शरण में आए हैं हम तुम्हारी, दया करो हे दयालु भगवन’’ भजन की प्रस्तुति दी।
आज की सभा में पूना, दिल्ली, मुंबई, जयपुर, समराला (पंजाब) आदि जगहों से श्रद्धालु दर्शनार्थ उपस्थित हुए।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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