आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव आचार्य सम्राट डॉ. शिवमुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि जब कोई साधक साधना करता है तो जीवन में उपसर्ग आते हैं, बाधाएं, कष्ट आते हैं उस कष्टों और संघर्षों को पार करता, सहन कर लेता है उसे भगवान महावीर के साधु या श्रावक कहते हैं। साधु या श्रावक बन जाने पर भी कष्टों को सहन करता पड़ता है क्योंकि जो पूर्व कर्म किये हुए हैं वे किसी न किसी रूप में औदारिक शरीर पर निकलते हैं।
उन्होंने फरमाया कि जो शरीर मिला है चाहे वह बच्चे का है, स्त्री का है, पुरुष का है वह चार गति चौरासी लाख जीवायोनि में भ्रमण कर रहा है, क्योंकि जीव की सबसे बड़ी भूल है कि जीव ने अपने को नहीं जाना। मूलतः जीव ने कोई पाप नहीं किया, चोरी नहीं की, झूठ नहीं बोला किंतु जीव की एक ही भूल मिथ्यादर्शन कि उसने अपनी शक्ति इस पिण्ड को दे दी।
भगवान महावीर की साधना जो साधक साधना करते हैं दो तत्व अलग-अलग है। दो तत्व आकार और निराकार में उस जीव को देखो। जिस तरह से घड़ी का बाहरी आकर अलग हो सकता है किंतु समय एक समान है उसी प्रकार आकार सबका अलग-अलग भिन्न है मूल आत्मा का अस्तित्व है।
उन्होंने यह भी फरमाया कि जब तक बुढापा नहीं आता, आधि-व्याधि नहीं आती धर्म का आचरण कर लेना चाहिए। भगवान महावीर गणधर गौतम को बोलते हैं कि हे! गौतम क्षण मात्र प्रमाद मत करो। हम दिन में कितना प्रमाद करते हैं? यह विचारणीय है, क्योंकि अंत समय में कोई साथ जाने वाला नहीं है, इसलिए प्रमाद नहीं करना चाहिए।
उन्होंने यह भी फरमाया कि चुलनीपिता एक साधारण गृहस्थ नहीं था। वह बहुत बड़ा पूंजीपति था। उसका नाम चुलनीपिता था। कभी-कभी सन्तान अपने माता-पिता से आगे बढ़ जाती है। शास्त्र ने इसे अतिसंतान कहा गया है। जैसे भगवान महावीर सिद्धार्थ से बहुत आगे चले गए। त्रिशला के जीवन से बहुत आगे बढ़ गए। त्रिशला और सिद्धार्थ को तो देवलोक ही प्राप्त हुआ, क्योंकि उन्होंने जीवन की सन्ध्या में श्रावक व्रत ले लिए थे, किन्तु भगवान महावीर ने निर्वाण को प्राप्त कर लिया। कभी-कभी सन्तान अपने माता-पिता से जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आगे बढ़ जाती है।
श्रमण संघीय प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि जब तक व्यक्ति की दृष्टि सम्यक नहीं होती तब तक सारा ज्ञान मिथ्या है। जीव और जीव दो तत्व मुख्य है। जीव अजर अमर है जीव का कभी नाश नहीं होता केवल पर्याय बदलता है।
प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी म.सा. ने ‘‘मिले जो तुम हमें गुरुवर सब कुछ हमने पाया’’ भजन की प्रस्तुति दी।
आज की सभा में पूना, शिरड़ी, औरंगाबाद, जयपुर आदि क्षेत्रों से श्रावक गुरु दर्शन हेतु उपस्थित हुए।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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