पुरुषार्थ से होती है सिद्ध गति की प्राप्ति |

- आचार्य शिवमुनि

1 August 2026

आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव आचार्य सम्राट पूज्य डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में आचार्य पूज्यपाद द्वारा रचित समाधितंत्र ग्रंथ की चर्चा करते हुए फरमाया कि समाधितंत्र सुंदर ग्रंथ है, इस ग्रंथ में आत्मा के बारे में वर्णन मिलता है। आचार्य पूज्यपाद सिद्ध भगवान को नमन करते हैं। सिद्ध भगवान वह जो आत्मा को आत्मा के रूप में और आत्मा से अन्य को पर के रूप में जानते हैं। जिन्होंने ऐसा पुरुषार्थ किया जो अनंत सिद्धों में लीन हो गये।

उन्होंने आगे फरमाया कि सिद्ध भगवान भी संसारी थे, परिवार में गृहस्थी की तरह रहते थे, पर उन्होंने जड़-जीव का भेद करते-करते जीव में स्थित होकर घनघाति कर्म को तोड़कर सिद्ध गति को प्राप्त किया। जैसे उन्होंने अपने भीतर के अष्टगुण प्रकट किये वैसे कोई भी साधक सिद्धों जैसा पुरुषार्थ कर अनंत ज्ञान, अनंत सुख को प्राप्त कर सकता है और सिद्ध गति को प्राप्त कर सिद्ध-बुद्ध बन सकता है।

मनुष्य किसी देहधारी को देखे तो उनमें जीव तत्व को उनकी आत्मा को देखे। देह को देखते हैं तो कर्मों का बंधन होता है, इसलिए प्रत्येक प्राणी में अष्टगुणों से युक्त आत्मा को देखें तो कर्मों का बंधन नहीं होगा।

आचार्य भगवन ने समाधितंत्र की प्रथम गाथा मंगलाचरण का विश्लेषण करते हुए फरमाया कि मंगल का अर्थ है ममकार और अहंकार को तोड़ना। मंगल का विधेयात्मक अर्थ है कि भीतर सुख समृद्धि सौभाग्य बढ़े। हमें अपने जीवन के अहंकार को छोड़कर भीतर की सुख समृद्धि को बढ़ाना है। इससे जीवन का कल्याण हो सकता है।

इससे पूर्व प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में जीव और कर्म के संबंध को अनादि काल का बताते हुए फरमाया कि जीव अमूर्त है जो आंखों से दिखाई नहीं देता, और पुद्गल मूर्त है। जिस तरह दीपक बाती के द्वारा तेल को ग्रहण कर ऊष्णता से ज्वाला में परिणत कर देता है, उसी तरह जीव कषाय विकार से योग्य पुद्गलों को ग्रहण करके कर्म रूप में बदल देता है। इससे सिद्ध होता है कि जीव और कर्म का संबंध अनादि काल से है। पूर्व कर्म जब उदय आता है तो जीव मोह राग द्वारा भाव कर्म करता है। यदि वहां भाव कर्म नहीं करते हुए जब कर्म उदय में आए तो ज्ञाता-दृष्टा भाव से स्वभाव में रहे तो उस चक्र को रोक सकता है।

श्री शाश्वत मुनि जी म. सा. ने ‘‘दूर हो कर्मों के बंधन पाऊं सीमंधर दर्शन’’ भजन के द्वारा अपनी भावनाएं व्यक्त की।

ऑनलाईन के माध्यम से तपस्या करने वालों ने उपवास, एकासन, आयंबिल आदि की तपस्या का पचक्खान ग्रहण किया

आत्म भवन में प्रतिदिन प्रातः 6.15 से 7.15 आत्म ध्यान, प्रातः 9.30 से 10.30 स्वाध्याय, ध्यान एवं मंगल पाठ होगा। आप सभी लाभ लेकर अपन जीवन कृतार्थ करें।

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