
युवा मनीषी श्री शुभम मुनि जी ने जानकारी प्रदान करते हुए फरमाया कि आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. 18 अक्टूबर से 21 अक्टूबर 2025 तक आत्म ध्यान मौन साधना में रहेंगे। आचार्य श्री जी 22 अक्टूबर 2025 को वीर निवार्ण संवत का मंगल पाठ आत्म भवन अवध संगरीला में प्रदान करेंगे, जिसका जैनाचार्यजी यू-टयूब चैनल पर सीधा प्रसारण प्रातः 7.30 से किया जा सकेगा।
उन्होंने यह भी फरमाया कि दीपावली पर्व से पूर्व घरों की साफ-सफाई की जाती है। वैसे ही पर्व के तीन-चार दिनों में अधिक से अधिक शुक्ल ध्यान, लोग्गस का पाठ कर अपने भीतर की सफाई करेंगे तो जीवन और अधिक सुगम, पवित्र बनेगा।
प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी ने श्री उत्तरध्ययन सूत्र के ‘यज्ञीय’ का विवेचन करते हुए फरमाया कि भगवान महावीर के समय में दो परम्पराएं प्रचलित थी, जिसमें एक वैदिक परम्परा और दूसरी श्रमण परम्परा। वैदिक परम्परा में ब्राह्मण यज्ञ, कर्म काण्ड आदि को महत्त्व देते थे और उसे ही धर्म मानते थे। दूसरी ओर श्रमण परम्परा में प्रभु महावीर आंतरिक साधना को अधिक महत्त्व देते थे। भगवान महावीर की साधना व तप भीतर का था।
उन्होंने आगे फरमाया कि जयघोष मुनि उपदेश देकर विजयघोष मुनि को बताते हैं कि यज्ञ क्या है? यज्ञ कैसे करना चाहिए? साधना आराधना किस की प्रकार करनी चाहिए? कौन सच्चा ब्राह्मण होता है? उसके बारे में उपदेश देकर सच्चे ब्राह्मणत्व की ओर विजयघोष को आगे बढ़ाते हैं। सच्चा ब्रह्मत्व ब्रह्मचर्य के पालन से ही भीतर में आता है। जन्म चाहे ब्राह्मण कुल में हुआ है किंतु इसे ऐसे ही व्यर्थ नहीं गंवाना है जीवन में सत्यता को स्वीकार कर ब्रह्मत्व की साधना जीवन में अपनानी है, जिससे जीव को सिद्ध गति प्राप्त हो सके।
उन्होंने 26वें अध्ययन साधु समाचारी के बारे में फरमाया कि समाचारी का अर्थ है सम्यक् आचरण करना। व्यक्ति का जितना सम्यक आचरण होता है व्यवहार भी उतना सम्यक होता है। श्रमण के आचरण में गुरु आज्ञा का अधिक महत्त्व है। एक शिष्य के लिए गुरु आज्ञा ही सर्वोपरि होती है। शिष्य को गुरु आज्ञा के साथ संयम का पालन करना चाहिए।
इससे पूर्व युवा मनीषी श्री शुभम मुनि जी एवं प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी ने तीसवें अध्ययन ‘तपोमार्ग गति’ की 37 व इकतीसवां अध्ययन ‘चरण विधि’ की 21 गाथाओं का मूल वांचन किया।
श्री शुभम मुनि जी ने श्री उत्तराध्ययन सूत्र वांचन से पूर्व एवं सम्पन्नता के पश्चात् आत्म ध्यान का प्रयोग करवाया।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
WhatsApp us
