चातुर्मासिक सम्पन्नता पर आचार्य सम्राट डॉ. शिव मुनि जी म.सा. के सान्निध्य में श्रावक-श्राविकाओं सामूहिक रूप से नवकार महामंत्र का जाप किया गया। चातुर्मास समापन पर उन्होंने अपने उद्बोधन में फरमाया कि यदि कोई भी श्रावक सही तरह से श्रावक व्रत ग्रहण कर वह अपने जीवन का कल्याण कर सकता है।
उन्होंने गोशालक श्रावक के प्रसंगों के उल्लेख में फरमाया कि गोशालक ने प्रभु महावीर को ‘महामाहण’ कहा। स्वयं को उसने गौण कर दिया। यह नीति है। साम, दाम, दण्ड और भेद-यह चार प्रकार की नीति है। साम-शान्ति की नीति का। वह अपना काम शान्ति से कर रहा है। शकडालपुत्र को उसने कहा कि भगवान महावीर महामाहण हैं। ‘महामाहण’ का अर्थ है कि ‘मत मारो’ का उपदेश देने वाले परम अहिंसावादी। सम्यक् ज्ञान-दर्शन-चारित्र से सम्पन्न और संसार को इस रत्नत्रय का मार्ग देने वाले परम अहिंसावादी, अमृतयोगी भगवान महावीर क्या तुम्हारी कर्मशाला में आकर विराजमान हुए थे? एक विशेषण उसने दिया महासार्थवाह। सार्थवाह का अर्थ है-व्यापारी। जैसे सार्थवाह अन्य व्यापारियों को अपने साथ ले जाते हैं, इसी प्रकार भगवान महावीर मोक्ष प्राप्त करने वाले हैं, वे दुनिया को जो धर्म का मार्ग दे रहे हैं, वे चाहते हैं कि जैसे मैं मोक्ष प्राप्त कर रहा हूं, मेरे साथ अन्य प्राणी भी मोक्ष प्राप्त कर लें। भगवान महावीर को एक अन्य विशेषण उसने दिया- ‘महागोप’। गोप ग्वाले को कहते हैं। ग्वाला गऊएं ले जाता है। जंगल में चराता है। सायंकाल को उन्हें अपने-अपने घरों में पहुंचा देता है, किन्तु वह सभी गायों की रक्षा करने वाला होता है। इस संसार की चरागाह में जितने लोग हैं, उन्हें सुरक्षित निर्वाण स्थान पर पहुंचाने का प्रयत्न करने के कारण भगवान महावीर को ‘गोप’ की संज्ञा दी गई है। गोशालक ने प्रभु को ‘महाकथी’ कहा। कथी यानि जो कथा करता है। कथा कोई भी कर सकता है, किन्तु महाकथा कोई नहीं कर सकता। वचन कोई भी बोल सकता है परन्तु प्रवचन कोई नहीं कर सकता। प्रवचन तीर्थकर कर सकते हैं। जो वीतराग, केवली हैं, वे प्रवचन दे सकते हैं।
तीर्थंकर प्रत्येक व्यक्ति को मोक्ष का मार्ग देते हैं। सभी प्रकार के स्वार्थों से वे मुक्त रहते हैं। इसलिए उनकी कथा सामान्य कथा नहीं होती। उनकी कथा असाधारण होती है। इसलिए उन्हें महाकथी कहा गया। गोशालक ने भगवान को ‘महानिर्यामक’ भी कहा। निर्यामक मल्लाह को कहते हैं। जैसे मल्लाह नौका के द्वारा यात्रियों को परले किनारे पहुंचा देता है। इसी प्रकार प्रभु वीर संसार समुद्र में डूबते-उतराते लोगों के लिए मांझी के समान थे जो मोक्ष रूपी किनारे तक पहुंचाने में सहायक थे। इसलिए उन्हें महानिर्यामक कहा गया है।
इससे पूर्व श्रमण संघीय प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में तत्वार्थ सूत्र की वांचना में अंतिम सूत्र मोक्ष की चर्चा करते हुए फरमाया मोक्ष है परम लक्ष्य को प्राप्त करना। है कर्मों से पूर्ण से मुक्ति ही मोक्ष है।
इससे पूर्वक प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी म.सा. ने ‘‘चौमासा गया है बीत, हमें तो अब जाना है जाना, साधुचर्या की है यह रीत हमें तो अब जाना है जाना’’ भजन की प्रस्तुति के साथ उद्बोधन दिया। श्री शौर्य मुनि जी म.सा. ने उद्बोधन के माध्यम से अपनी भावनाएं प्रकट की।
चातुर्मासिक पूर्णाहुति पर अवध संगरीला के श्रावक श्राविकाओं व शिवाचार्य आत्म ध्यान फाउण्डेशन के पदाधिकारियों ने सफल चातुर्मासिक सम्पन्नता पर चारित्रात्माओं के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की एवं चातुर्मास प्रवास के दौरान प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से सहयोग देने वालों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया।
विशेष – आचार्य सम्राट डॉ. शिवमुनि जी आदि ठाणा चातुर्मास स्थान परिवर्तन हेतु प्रातः लगभग 8.15 बजे प्रस्थान कर रमेश भाई बोकड़िया के निवास स्थान बंगला नं. 115-116 में पधारेंगे।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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