श्रमण संघ के चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट डॉ. शिवमुनि जी म.सा. ने आत्म भवन में उपस्थित धर्म सभा को संबोधित करते हुए श्रावक के अतिचारों की व्याख्या की और फरमाया कि दूसरे व्यक्ति को हर समय गलत शिक्षा देते रहना, दूसरों के बारे में गलत बातें बताना, किसी पर झूठा कलंक लगाना, बिना जांच-पड़ताल किए किसी के विषय में कोई बात बोल देना, यह उसके चरित्र पर दोषारोपण है। झूठे दस्तावेज बनाना, झूठे हस्ताक्षर करना, किसी दूसरे की धरोहर हड़प लेना, और दूसरे के रहस्य, गुप्त बातों का प्रचार करना आदि अतिचारों से श्रावक को बचने का प्रयास करना चाहिए।
उन्होंने राजा और उसके पुत्र की कहानी सुनाते हुए बताया कि कैसे राजा का लड़का अपने स्वार्थी मित्रों की गलत संगत से दुर्व्यसनों में फंस जाता है, जिससे राजा चिंतित रहता है। राजा कई बार जब राजकुमार को मुनिराज के पास लेकर जाता है, तो राजकुमार को मुनिराज का उपदेश रुचिकर नहीं लगता और वह बीच में उठकर चला जाता है। इस प्रकार दो-तीन बार होता है। फिर एक बार, जब कोई नए मुनिराज नगर में पधारते हैं और वे अपने उद्बोधन में सत्य बोलने को परम धर्म बताते हैं, “जहां सत्य है, वहीं परमेश्वर है; सत्य ही भगवान है,” इस बार मुनिराज का उपदेश सुनकर राजकुमार बहुत प्रसन्न होता है और वह मुनिराज से जीवन पर्यन्त सत्य बोलने की प्रतिज्ञा ले लेता है। जब राजकुमार के स्वार्थी मित्र व्यसन और राज के खजाने की चोरी के लिए राजकुमार को कहते हैं, तो वह कहता है, “मैं झूठ नहीं बोलूंगा क्योंकि मैंने मुनिराज से सत्य बोलने की प्रतिज्ञा ली है।” इस भय से वे स्वार्थी मित्र राजकुमार के पास आना छोड़ देते हैं, और राजकुमार भी बुरी आदतों से दूर होकर अच्छा इंसान बन जाता है।
उन्होंने यह भी फरमाया कि यदि व्यक्ति अपने जीवन में कोई एक नियम या प्रतिज्ञा धारण कर लेता है, तो वह कई बुराइयों से बच सकता है और अपने जीवन को सरल व अच्छा बना सकता है।
उन्होंने आगामी 21 अगस्त को लगने वाले ऑनलाइन आत्म ध्यान शिविर की चर्चा करते हुए कहा कि शिविर में भाग लेकर व्यक्ति प्रभु की वाणी को सुनकर आत्मानुभूति का पुरुषार्थ कर सकता है और अपनी आत्मा को जान सकता है, जिससे आत्मा में स्थित रहने की कला उसके जीवन में आ सकती है।
इससे पूर्व श्रमण संघीय प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने जीव के भव एवं उनकी आयु के बारे में व्याख्या की।
इस अवसर पर श्री शमित मुनि जी म.सा. ने “नाम प्रभु का ले ले” भजन की प्रस्तुति दी।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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