श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर ध्यान गुरु आचार्य सम्राट डॉ. शिव मुनि जी म.सा. ने अपने दैनिक प्रवचन में फरमाया कि व्यक्ति के जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान धर्म का है। जो आपने धर्म के संस्कार लिए हैं, ये आपके हृदय पटल पर अंकित रहेंगे। उनके अनुसार आप कार्य-क्षेत्र में कार्य करेंगे। आप जहां जाते हैं, धर्म आपके साथ जाता है। चारित्र, व्रत जो आपने लिए हैं, वे आपके साथ हैं। आपने जो मर्यादाएं बनाई हैं, वे आपके साथ हैं। वे ही मेरे साथ हैं। इस दृष्टि से धर्म सदैव हमारे और आपके अंग संग रहता है। यदि आपका इस पर विश्वास बना हुआ है, फिर आप जिन्दगी में कहीं डांवाडोल नहीं हो सकते। आप स्थिर रहते हैं। व्यक्ति जब धर्म में दृढ़ होता है तो उसका दुःख सुख में परिवर्तित हो जाता है।
उन्होंने आगे फरमाया कि कामदेव चम्पा का वासी था। वह जैन धर्म का तीर्थ है। भगवान महावीर के चातुर्मास वैशाली, राजगृही, चम्पा में प्रायः पुनः-पुनः होते थे। चम्पा जैन इतिहास में बहुत प्रसिद्ध नगरी है। उसके पास अठारह करोड़ की सम्पत्ति थी। इतनी सम्पत्ति होने पर भी वह निरभिमानी था। उसकी स्त्री का नाम भद्रा था। भगवान महावीर की वाणी उसने कभी सुनी नहीं थी। कभी चम्पा नगरी में भगवान महावीर का आगमन हुआ और कामदेव उनकी वाणी श्रवण करने के लिए चला गया। भगवान की वाणी ने उसके हृदय को बांध लिया। लोग चले गए। कामदेव ने कहा-प्रभु मुझे आपने जो बताया उस मार्ग पर श्रद्धा है, आस्था है, मैं बारह व्रत ग्रहण करना चाहता हूं। भगवान ने अहासुहं देवानुप्पिया कहा, किंतु यह भी साथ कहा कि मा पडिबंधं करेह। धर्म के कार्य में कामदेव! विलम्ब नहीं करना चाहिए। इस जीवन का कोई विश्वास नहीं है। कामदेव ने भी आनंद की भांति प्रभु की वाणी सुनकर सम्यग्दर्शन को प्राप्त कर बारह व्रतों को ग्रहण कर लिया और वह भगवान का श्रमणोपासक बन गया। आनंद के समान कामदेव ने भी अपने ज्येष्ठ पुत्र को गृहस्थ के सम्पूर्ण दायित्व संभाल दिए और स्वयं निवृत्त हो गया। सम्पत्ति का व्यामोह त्यागकर, निस्पृह होकर वह भी पौषधशाला में जाकर धर्मध्यान में बैठ गया। उसने पौषध ले लिया और जीवन मरण के व्यामोह से वह बहुत ऊपर चला गया। धर्मध्यान और साधना को उसने जीवन का गुरु मंत्र बना लिया।
इससे पूर्व श्रमण संघीय प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में तत्वार्थ सूत्र के आठवें अध्याय की चर्चा में कर्म बंध के स्वरूप की चर्चा करते हुए फरमाया कि कषाय सहित होने से जीव कर्म के योग्य पुद्गलों को ग्रहण करता है। योग के द्वारा व्यक्ति के भीतर में कर्म प्रदेश आते हैं और पूर्व भव के कषाय साथ रहने से, उस कषाय के साथ रहने से, क्षय से मैं आसक्त आत्मा विभाव दशा की आत्मा बाहर के जो योग द्वारा पुद्गल आते हैं उस कषाय के साथ लगकर कर्म की एक नई दिवार भारी-भारी बनती जाती है, वही बंध हैं। जीव अपने आपमें निर्लेप है। बंध चार प्रकार के हैं पहला प्रकृति, स्थिति, अनुभाव, और
प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी म. सा. ने ‘‘कुछ पल की जिंदगानी, एक रोज सबको जाना, बरसों की क्यों तू सोचे एक पल का नहीं ठिकाना’’ भजन की प्रस्तुति दी।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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