



प्रमुखमंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि स्वाध्याय की परम्परा प्राचीन काल से चली आ रही है। प्राचीन काल में आगम कंठस्थ किये जाते थे, वर्तमान में लिखे जाते हैं। आगम को लिपीबद्ध करने में लाभ हुआ किंतु जो भाव थे वह छूट गये। शब्दों के पीछे जो भाव थे उसे अभिव्यक्त करना संभव नहीं है, इसलिए जब भी कोई शास्त्र पढ़ना हो तो ज्ञानी पुरुष के सान्निध्य में बैठकर पढना चाहिए। ध्यान की विधि ज्ञानी पुरुष से मिल जाती है। ध्यान करते-करते चित्त में स्थिरता आती है। जब तक चित्त स्थिर नहीं होता है तब तक ध्यान में मन नहीं लगता है, इसलिए चित्त स्थिरता के लिए ध्यान आवश्य है।
उन्होंने आगे फरमाया कि ध्यान, प्राणायाम से चित्त स्थिर होता है। भगवत गीता में भी मन को स्थिर करने के लिए प्राण का सहारा बताया गया है, वैसे ही जैन धर्म में शुक्ल ध्यान और धर्म ध्यान की बात कही गई है। आत्म ध्यान में मन को स्थिर करने के लिए शुभ आलम्ब का सहारा लिया जाता है, जिसमें सबसे पहले श्वांस पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है उसके बाद ‘सोह्म’ ‘कोह्म’ के द्वारा धीरे-धीरे चित्त शांत होने लग जाता है और मन विचारों से निर्विचार होने लग जाता है।
उन्होंने यह भी फरमाया कि आत्म ध्यान साधना शिविर में साधक को 12 प्रकार के तप, मौन, उणोदरी, प्रायश्चित, आलोचना करवाई जाती है। विनय, वैयावच्च, स्वाध्याय ये ध्यान के पूरक तत्व हैं। काया का जितना मोह छोड़ते हैं उतनी ही आत्मा निर्मल होती है, कर्म के आवरण हटते चले जाते हैं।
प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी म.सा. ने ‘‘वीर प्रभु की अंतिम वाणी सुन लो और सुना दो जीवन धन्य बना लो’’ भजन की प्रस्तुति के साथ श्री उत्तराध्ययन सूत्र वांचन के द्वितीय दिवस में दूसरे, तीसरे, चौथे, पांचवे अध्ययन का मूल वांचन किया।
इस अवसर यादगिरी (कर्नाटक) श्रीसंघ के अलावा दिल्ली, रायपुर (छत्तीसगढ़), जयपुर, भीलवाड़ा, इन्दौर, आदि स्थानों से श्रद्धालु उपस्थित थे।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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