साधना का मार्ग है जीव अपने अस्तित्व में रहे |

7 AUGUST 2024

‘‘जीव अनादिकाल से है और वह शुद्ध जीवात्मा है जो हर प्राणी के पास है जिसके रूह, सोल अलग-अलग नाम हो सकते हैं। इस जीव ने 4 गति 84 लाख योनियों में एक छोटे कीट पतंगे से लेकर बड़े से बड़े हाथी जैसे जीवायोनियों में भ्रमण किया।’’ उपरोक्त विचार श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट डॉ. शिव मुनि जी म.सा. ने आत्म भवन में उपस्थित धर्म सभा को संबोधित करते हुए अपने उद्बोधन में फरमाये।

उन्होंने आगे फरमाया जीव ने एक ही भूल की वह जिस गति में गया उसे अपना मान लिया। जैसे कोई व्यक्ति अपने पुत्र के लिए कहता है कि यह मेरा पुत्र है, उस व्यक्ति की अपने पुत्र के प्रति आत्मीयता जुड़ जाती है और वह व्यक्ति उसे सब कुछ दे देता हैं, दूसरे को नहीं देता क्योंकि उसे अपने पुत्र के प्रति मोह का भाव पैदा हो गया, इसी प्रकार इस जीव ने एक भूल की वह है अपने शरीर के प्रति मोह, जिससे वह इस संसार से मुक्त नहीं हो सका अर्थात मोक्ष को प्राप्त नहीं कर सका।

उन्होंने यह भी फरमाया कि जीव का स्वभाव है ज्ञाता दृष्टा भाव। इस देह रूपी शरीर के साथ अनेक समानता, विषमताएं, घटनाएं आती है। मन और बुद्धि के द्वारा वह उसे अपना मान लेता है। मन और बुद्धि के साथ जुड़ने से मन जीव की सारी शक्ति ले लेता है इस कारण फिर इन्द्रियां उस पर हावी हो जाती है और वह उन इन्द्रियों में लिप्त हो जाता है जिससे कर्मों का बंध हो जाता है
उन्होंने आगे फरमाया कि जीव अपने स्वभाव में ठहर जाए उसकी सर्वोच्च विधि है आत्म ध्यान। जिस तरह से सोने की खदानों में विभिन्न प्रक्रियाओं से मिट्टी में से सोना निकाला जाता है उसी प्रकार मनुष्य गहन आत्म ध्यान के द्वारा राग-द्वेष को छोड़ सकता है और निर्लिप्त रहते हुए अपनी आत्मा को पवित्र बना सकता है।

श्रमण संघीय प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने तत्वार्थ सूत्र का विवेचन करते हुए पृथ्वीकाय, अपकाय, वनस्पति जीव व उनके प्रकारों के बारे में बताया।

श्रमण संघीय सहमंत्री युवा मनीषी श्री शुभम मुनि जी म.सा. ने ‘‘अभी समय है हाथ में ले लो संबल साथ में’’ भजन की प्रस्तुति दी।

विशेष : दिनांक 21 से 24 अगस्त 2024 को निःशुल्क चार दिवसीय ऑनलाईन आत्म ध्यान शिविर का आयोजन आत्म भवन अवध संगरीला से नाशिक, कुप्पकलां, चेन्नई, वीर नगर दिल्ली, उदयपुर, लोंगोवाल इन स्थानों पर होने जा रहा है, आत्मार्थी साधकगण लाभ ले सकते हैं।

- आचार्य शिवमुनि

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