दान के साथ है भावना का महत्त्व |

29 SEPTEMBER 2024

श्रमण संघ के चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट डॉ. शिवमुनि जी म.सा. ने रविवार को अपने उद्बोधन में अतिथि संविभागव्रत का उल्लेख करते हुए फरमाया कि जिसके आने की कोई तिथि, दिन या समय नियत नहीं है, जो बिना ही सूचना के अनायास आ जाता है, उस अतिथि के लिए संविभाग करना। मन में भावना रखें कि कोई साधु, मेहमान आए जो भोजन बना उसमें से कुछ उन्हें दान दूं, यदि उच्च भावों से देते हैं तो अनंत कर्मों की निर्जरा होती है।

उन्होंने यह भी फरमाया कि पाश्चात्य संस्कृति के कारण बच्चों का जन्म दिन केक काटकर मनाते हैं जो हमारी भारतीय संस्कृति नहीं है। बच्चों को उनके जन्म दिन पर गौशाला या वृद्धाश्रम में लेकर जाना चाहिए और उनके हाथ से दान दिलाना चाहिए जिससे उनमें दान देने के साथ अच्छे संस्कारों का निर्माण होगा। जिस तरह से वृक्ष फल देते है, पृथ्वी का कण-कण हमें देता है, तीर्थंकर भगवान भी जब दीक्षा लेते हैं तो बारह महीने लगातार एक करोड़ आठ लाख अशर्फियां दान देते थे। देने वाले और लेने वाले की भावना का भी अलग महत्त्व होता है।

उन्होंने भगवती सूत्र में उल्लेखित तुंगिया नगरी के श्रावकों का वर्णन में फरमाया कि तुंगिया नगरी में श्रावकों के घर के द्वार खुले रहते थे, वे बहुत-सा आहार-पानी तैयार करते थे और बहुत से लोगों को देते थे। बहुत-से दासी दास, श्रावक होकर भी अनुदार या कृपण नहीं थे। कई मध्यम व जघन्य सुपात्रों को भी वे आहार-पानी देते थे। वे समझते थे कि इस प्रकार आहार-पानी का दान मुक्तहस्त से देने पर कदाचित् मुनिवर भी हमारे यहाँ पधार जाएँ।

इससे पूर्व श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने जिनवाणी के तत्वार्थ सूत्र के छठे अध्ययन में आश्रव की चर्चा करते हुए फरमाया कि कषाय सहित आश्रव 39 भेद-प्रभेद में पांच प्रकार के अव्रत में हिंसा, झूठ, चोरी, मैथुन, परिग्रह। चार प्रकार के कषाय क्रोध, मान, माया, लोभ पांच इन्द्रियां और पच्चीस क्रियाएं सभी मिलाकर 39 भेद-प्रभेद हैं जो कर्म आने के रास्ते हैं।

मधुर गायक श्री निशांत मुनि जी म.सा. ने ‘‘आत्म भावों को हरदम निहारा करो, एक अर्हम-अर्हम पुकारा करो’’ भजन की प्रस्तुति दी।

- आचार्य शिवमुनि

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