

प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने श्री आचारांग सूत्र में उल्लेखित भाव लोक पर विजय प्राप्त करने की विधि की चर्चा करते हुए फरमाया कि भाव लोक आर्त्त-रौद्र ध्यान, राग-द्वेष, मन, वचन, काया से भरा हुआ है जो कार्मण शरीर के रूप में व्यक्ति के साथ चल रहा है। स्वयं के बोध के अभाव में अज्ञानी जीव राग युक्त विषय भोगों में आसक्त रहता है। अपनी अज्ञानता के कारण जहां सुख नहीं है वहां सुख ढूंढता है। व्यक्ति स्वयं का निरीक्षण करे कि मैं कहां हूं? कहां जाना है? जैसे सिद्ध भगवान में आत्मा है वैसे सब जीवों में समान आत्मा है। जो आत्मा को महत्त्व देता है। आत्मा के कल्याण के लिए चिंतन करता है। अपनी आत्मा को केन्द्रीभूत बनाता है वही आत्मार्थी साधक है।
उन्होंने आगे फरमाया कि जीव में अनंत ज्ञान, अनंत शक्ति है, उसे कुछ नहीं चाहिए। जिसे अनंत सुख मिल रहा है वह विषय भोगों में, अनुकूलता-प्रतिकूलता की चाह नहीं रखता। आत्मार्थी साधक विषय वासनाओं से निर्लिप्त रहने के लिए सदा सजग रहता है। निर्लिप्त रहना अप्रमत्त दशा है। आत्मार्थी साधक अपने प्रत्येक समय के प्रति सजग रहने का पराक्रम करता है। यदि कोई क्षण पुदगल में, बेहोशी में चला जाता है तो उसी समय प्रायश्चित, प्रतिक्रमण करता है जिसे सातवां तप कहा गया है। आलोचना में प्रतिक्रमण कर कर्मों को निर्जरित करता है।
उन्होंने यह भी फरमाया कि माता-पिता अपने संतान के प्रति मोह रखते हैं कि मेरा बेटा, मेरी बेटी जब वह बड़ा हो जाता है और बड़ा होते ही अलग हो जाता है तो अधिक मोह से माता-पिता दुःखी हो जाते हैं। बच्चे के जन्म से यह चिंतन रहे कि मेरे उदय कर्म से यह पुत्र या पुत्री है, इसका पालन-पोषण करना मेरी जिम्मेदारी है किंतु ज्यादा मोह नहीं करते हैं तो दुःखी नहीं होते, मोह ही दुःख कारण बनता है।
उन्होंने राग भाव को दुःख का कारण बताते हुए फरमाया कि दुःख का मूल कारण राग-द्वेष, आसक्ति और मोह है इसी कारण विषय भोगों को भोगने की इच्छा रहती है। ऐसे भोगों से साधक को दूर रहना चाहिए।
मधुर गायक श्री निशांत मुनि जी म.सा. ने ‘‘नहीं चाहिए, दिल दुखाना किसी का, सदा ना रहा है, सदा न रहेगा जमाना किसी का’’ भजन की प्रस्तुति देते हुए षड़ावश्यक के चतुर्थ आवश्यक प्रतिक्रमण पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को सुबह शाम को द्रव्य प्रतिक्रमण या भाव प्रतिक्रमण अवश्य करना चाहिए। इससे कर्मों की निर्जरा होती है
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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