जो धर्म के स्वरूप को समझता है धर्म उसको महान बनाता है |

28 OCTOBER 2024

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर ध्यान गुरु आचार्य सम्राट डॉ. शिव मुनि जी म.सा. ने अपने दैनिक उद्बोधन में फरमाया कि धर्म उस व्यक्ति को महान बनाता है जो धर्म के स्वरूप को ठीक समझ लेता है। इसीलिए तो मानव के चरणों में देवता नमन करते हैं। ऐसा शास्त्र ने स्वीकार किया है। वहीं दृश्य हम कामदेव के जीवन में देख रहे हैं। कामदेव शांत है। उसने कुछ नहीं कहा। आलोचना नहीं की। स्पष्टीकरण नहीं किया। देवता की भर्त्सना नहीं की। उसे लज्जित नहीं किया। अपनी महानता का व्याख्यान नहीं किया। अपने सम्बन्ध में उसने कुछ नहीं कहा। वह मौनपूर्वक अपनी साधना में उसी प्रकार आंखें बंद करके स्थित रहा। तीन बार देव ने अपने क्षमापना के शब्दों को दोहराया और वह जिस दिशा से आया था, उस दिशा की ओर चला गया।

उन्होंने आगे फरमाया कि कामदेव पुनः साधना में लीन हो गया। अभी उसने अपना पौषध पूर्ण नहीं किया। इधर से भगवान महावीर जनपदों में विचरण करते हुए पुनः चम्पा नगरी में पधारे। यह समाचार कामदेव को मिला। कामदेव श्रावक के मन में विचार आया कि पौषध पूर्ण करने से पूर्व में भगवान महावीर के दर्शन करूं। उनके चरणों में नमन करूं क्योंकि वे चम्पा में पधारे हैं। यह मेरा प्रथम कर्त्तव्य है। ऐसा सोच कर उसने गृहस्थ वस्त्र धारण किए। कुछ आभूषण भी पहने। एक छत्र लिया और कर्मचारियों को अपने साथ लिया। बड़ी श्रद्धा से वह प्रभु के समवसरण की ओर चला।

भगवान ने कामदेव को देखकर कहा-कामदेव। मध्य रात्रि के समय क्या तुम्हारे जीवन में इस इस प्रकार के देव उपसर्ग आए? क्या पौषधशाला में देवता आया? उसने पिशाच, हाथी, सर्प का रूप बनाकर तुम्हें धर्म मार्ग से विचलित करने का प्रयास किया? कामदेव ने हाथ जोड़ दिए और कहा- हाँ, प्रभु। जैसा आप फ़रमा रहे हैं, यह बात बिल्कुल ऐसे है।

भगवान महावीर ने कामदेव से मध्यरात्रि के उपसर्ग सम्बन्धी बात कहने तथा कामदेव के स्वीकार करने के अनंतर उपस्थित साधु और साध्वियों को संबोधित करते हुए कहा-श्रमणों और श्रमणियों। यह कामदेव आपके समक्ष है। यह श्रावक है, गृहस्थ है। इसमें कितनी दृढ़ता है। गृहस्थ होकर भी देव उपसर्ग के समक्ष नतमस्तक नहीं हुआ। यदि एक गृहस्थ इतना दृढधर्मी हो सकता है, आप तो त्यागी हैं, आप तो श्रमण बन गए हैं, आपको अपने मार्ग में कितना दृढ़ रहना चाहिए, यह प्रेरणा आपको कामदेव के जीवन से लेनी चाहिए।

उन्होंने फरमाया कि भगवान महावीर ने कहा-कामदेव श्रावक देवलोक का चार पल्योपम का आयुष्य भोगने के अनंतर महाविदेह क्षेत्र में जन्म लेगा। वहां वह त्याग मार्ग अंगीकार करेगा, साधना करेगा और अपने कर्मों का क्षय करके वह महाविदेह क्षेत्र से मोक्ष प्राप्त करेगा।

इससे पूर्व युवामनीषी सहमंत्री श्री शुभम मुनि जी द्वारा भगवान महावीर की अंतिम वाणी श्री उत्तराध्ययन सूत्र की मूल वांचना संक्षिप्त विवेचन में कहा कि भोगों से हानि होती है तथा त्याग से सुख का बोध होता है। आराधक को त्याग व निर्लोभता की ओर कदम बढ़ाना चाहिए। जब जीव आराधना की उच्चतम भूमिका पर पहुंच जाता है तो फिर उसे संसार के पदार्थ अपनी ओर आकर्षित नहीं कर सकते। जो स्वयं और दूसरों को बंधनों से मुक्त करता है वही सच्चा ज्ञानी है। जाति मात्र से महान नहीं होता, सद्गुणों के कारण महान होता है।

आज की सभा में पूना से बालासाहब धोका अपने संघ के साथ गुरु दर्शन हेतु उपस्थित हुए।

- आचार्य शिवमुनि

For causes
that really matter