जहां धर्म है वहां कर्म बंधन नहीं होता |

- आचार्य शिवमुनि

24 OCTOBER 2025

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. ने श्रद्धालुओं को मंगल पाठ प्रदान करते हुए आत्म ध्यान का प्रयोग करवाया।

श्रमण संघीय प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने उद्बोधन में सामायिक पाठ के उल्लेख में फरमाया कि सामायिक पाठ में जो क्रिया लगी है उसका प्रतिक्रमण किया जाता है, सभी जीवों को अपने समान मानना, प्रत्येक जीव के प्रति क्षमा का भाव रहता है। इस शरीर से जो भी क्रिया लगी है उसका प्रतिक्रमण प्रायश्चित किया जाता है। बारह तपों में प्रायश्चित सातवां तप है। सामायिक एक व्रत है और व्रत एक तरह का संकल्प होता है, जिसमें 48 मिनिट तक अपनी आत्मा में स्थित रहना होता है। आत्मा में स्थित होने के लिए शरीर की सारी क्रियाओं से निवृत होना होता है। अज्ञानता वश, सांसारिक कार्यों के कारण लगे दोषों की विशेष शुद्धि की जाती है।

उन्होंने आगे फरमाया कि जैन दर्शन में तीन शल्य बताये हैं – माया शल्य, निदान शल्य और मिथ्या दर्शन शल्य। मिथ्या दर्शन शल्य में जो अपना नहीं उसे अपना मानना। मेरा मन, मेरे विचार, मेरी धारणा इस प्रकार के मन में विचार एकत्रित करना लड़ाई झगड़े का कारण बनता है। अपनी धारणा को मानसिक रूप से सकारात्मक दृष्टि से विचार किया जाए तो परिवार में शांति रह सकती हैं।

उन्होंने यह भी फरमाया कि ऐसा कोई स्थान, कुल नहीं जहां व्यक्ति ने जन्म नहीं लिया होगा। अनादिकाल के जन्म-मरण से निवृत होने के लिए भेद विज्ञान की साधना जरूरी है। शरीर से जुड़ी सारी माया है, पर है और पराई है मैं इसके भीतर रहने वाला जीव अलग हूं। जिस क्षण में कायोत्सर्ग में रहोगे, उससे अनंत कर्म क्षय होंगे और नये कर्म बंधेगे नहीं।

उन्होंने तीन योगों की चर्चा करते हुए फरमाया कि मन, वचन और काया इन तीनों योगों की चंचलता चाहे वह शुभ है या अशुभ है दोनों से ही कर्म बंधन होता है। जहां कर्म है वहां धर्म नहीं है, धर्म है वहां कर्म बंध नहीं सकता। बंधा हुआ कर्म धर्म से ही क्षय होगा। पुण्य कर्म से निरोगी काया, अच्छा परिवार, धन वैभव प्राप्त हो सकता है। सारी क्रियाओं में धर्म हो कर्म का बंधन न हो वही सामायिक एक शुद्ध सामायिक होती है। मन में कोई भी संकल्प-विकल्प न रहे तो जीव को केवल ज्ञान प्रकट हो सकता है।

इससे पूर्व मधुर गायक श्री निशांत मुनि जी म.सा. ‘‘मनवा कर ले निज चिंतन’’ सुमधुर भजन की प्रस्तुति देते हुए अपने उद्बोधन में परिग्रह को सीमित रखने की प्रेरणा दी साथ ही उन्होंने सुखी जीवन जीने के लिए संतोष धारण करना बताया।

आज की सभा में शिरड़ी, अहमदनगर, पूना, होशियारपुर, उदयपुर आदि जगहों के श्रद्धालु उपस्थित हुए।

विशेष – 25 अक्टूबर 2025, शनिवार से एक दिवसीय, चार दिवसीय एवं दस दिवसीय आत्म ध्यान धर्म यज्ञ का आयोजन नाशिक सेन्टर, आदीश्वर धाम कुप्पकलां (पंजाब), अम्बाला एवं जम्मू में आयोजित होगा।

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