जहां एकत्व है वहां शांति |

- आचार्य शिवमुनि

8 OCTOBER 2025

प्रमुखमंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में श्री उत्तराध्ययन सूत्र के नवें अध्याय की व्याख्या करते हुए नमी राजर्षी के वृतांत में फरमाया कि नमि राजर्षी जब ज्वर से पीड़ित हो जाते हैं। तो वैद्य के बताये अनुसार पांच सौ रानिया लेप के लिए चंदन घिसती है। रानियों की चुड़ियों की आवाज उनकी समाधि में बाधक बन रही थी।

 उन्हें चुड़ियों की आवाज सहन नहीं होती है। रानियां सुहाग के लिए एक चुड़ी प्रतिक के रूप में रखती है शेष निकाल देती है जिससे चुड़ियों की आवाज आना बंद हो जाती है। तब नमि राजर्षि अपने मंत्री को पूछते हैं कि क्या चंदन घिसना बंद कर दिया है। मंत्री कहता है – राजन! चंदन घीसा जा रहा है। क्योंकि रानियों ने हाथ में एक-एक चुड़ी रखी शेष निकाल दी है, जिससे चुड़ियों की आवाज नहीं आ रही है। एक का कोई शोर नहीं। 

राजा का चिंतन चला प्रज्ञा जागृत हुई कि अकेला किससे घर्षण करेगा। एकत्व के भाव से इतने गहरे चिंतन में उतर गए। जड़ जीव का भेद करते हुए जीव में स्थित हो गए भीतर से वैराग्य उठा कि मैं किसके प्रति राग-द्वेष, आर्त्त-रौद्र ध्यान कर रहा था, जब देह मेरी नहीं, मैं देह का नहीं ऐसा सोचकर वैराग्य में चले गये। व्यक्ति अपने जीवन में एकत्व भावना भाए, जीव अकेला है। जीव, जीव का ध्यान करना है, वही जीव मुक्त होगा। यह जड़ देह यही छूट जाएगी। जड़ के मोह का परित्याग करना है।

उन्होंने इस घटना के माध्यम से फरमाया कि शरीर पर श्रद्धा करना संसार है जीव अकेला है, जीव का जीव में स्थित करने की कला जिस व्यक्ति के जीवन में आ जाती है, वह अपने जीवन का कल्याण कर लेता है, इसलिए इस देह में जीव तत्व को जानते हुए अपने स्वभाव में रहने का प्रयास करना चाहिए।

इससे पूर्व प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी म.सा. ने बारहवें अध्ययन की 47 गाथा एवं तेरहवें अध्ययन 35 गाथाओं का मूल वांचन किया। नमि राजर्षि की सम्पूर्ण जीवन की कथा बताते हुए उनके जीवन से प्रेरणा प्राप्त करने का उद्बोधन दिया।

आज श्री नवपद आयंबिल ओली के समापन पर आयंबिल तप करने वाले श्री शोकीन पोखरना, सुश्री ज्योति मेहता का सम्मान किया।

इस अवसर पर आज मनमाड़, शिरड़ी से महिला मण्डल उपस्थित हुआ।

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