


आचार्य सम्राट डाॅ. शिवमुनि जी म.सा. ने ऑनलाइन आत्म ध्यान शिविर के तीसरे दिन उपस्थित धर्म सभा एवं शिविरार्थियों को संबोधित करते हुए फरमाया कि आत्म ध्यान शिविर के माध्यम से व्यक्ति यह जान सकता है कि जड़ और जीव दोनों में किसको अधिक महत्त्व दिया। व्यक्ति संसार की यात्रा में केवल देह को महत्त्व देता है, देह का चिंतन करता है और देह में सुख खोजने का प्रयास करता है, जो मन कहता है वही करता है, किंतु जो आत्मार्थी साधक है वह अपने अस्तित्व पर श्रद्धा करता है, वह मन और बुद्धि को गौण कर देता है।
उन्होंने फरमाया कि जैसे-जैसे संसार को महत्त्व दिया वैसे-वैसे मिथ्यात्व बढ़ता गया कि मैं स्त्री, मैं पुरुष, मेरा व्यक्तित्व आदि-आदि। पूरे जगत के लोग देह पर अटके हुए हैं कि देह को सुखी कैसे करूं, परंतु जो कर्म कार्मण शरीर पर लगे हैं, उसका क्षय करने पर विचार नहीं करते। कर्म बंधन वाले तत्व काम, क्रोध, मान, माया लोभ कैसे कम हो उस पर विचार करना चाहिए। आत्मिक सुख का अनुभव करने का एकमात्र उपाय है जीव को जानकर आकार में निराकार आत्मा में ठहरने का पुरुषार्थ करेे। काया पुरुष की है स्त्री की है उसमें जो मूल तत्व है वह है जीव आत्मा।
आचार्य श्री जीे ने ‘सोहम’ की साधना के बारे में बताते हुए फरमाया कि सभी में जीव तत्व एक समान है। नरक के नारकी में, छब्बीस देवलोक में, पूरे ब्रह्माण्ड में मेरा अस्तित्व रहेगा। अटल श्रद्धा रखो मैं जीव आत्मा हूं।
इससे पूर्व श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने वक्तव्य में फरमाया कि आप देह में है आप देह नहीं हो। यदि किसी को प्रतिकूल भोजन मिला तो वह क्रिया-प्रतिक्रिया कर मन को खराब कर लेता है और मोह कर्म का बंधन हो जाता है इस तरह से दिन में कितनी बार प्रतिक्रिया करता है यह विचारणीय है, व्यक्ति को कर्म बंधन से बचने का प्रयास करना चाहिए।
प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी म.सा. ने ‘‘आंखे बंद करूं या खोलूं मुझको दर्शन दे देना’’ भजन की प्रस्तुति दी।
आज अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के सुप्रसिद्ध हड्डी रोग विशेषज्ञ डाॅ. राजीवराय चैधरी आचार्य डाॅ. शिवमुनि जी म.सा. के दर्शन हेतु आए। डाॅ. चैधरी का शिवाचार्य आत्म ध्यान फाउण्डेशन की ओर से शाॅल, माला, प्रशस्ति पत्र द्वारा सम्मान किया।
डबवाली (पंजाब) में महासाध्वी श्री वीरकान्ताजी म.सा. की निश्राय में 17 नवम्बर 2024 को होने वाली दीक्षा की आज्ञा हेतु वैरागन खुशी मेहता उपस्थित हुई एवं अपनी भावनाएं व्यक्त की। खुशी मेहता का तिलक एवं साहित्य भेंट कर सम्मान किया।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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