







ध्यान योगी आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव आत्मानुशास्ता आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. आदि ठाणा-10 का चातुर्मास पश्चात् स्थान परिवर्तन हेतु आत्म भवन से 9.30 बजे विहार कर श्री तुलसीभाई चपलोत के निवास स्थान बंगला नं. 373 पर पधारे, जहां पर चपलोत परिवार ने पूज्यवरों के पदार्पण पर कृतज्ञता ज्ञापित की। इस अवसर पर अवध निवासियों के अलावा सूरत से भी श्रद्धालु उपस्थित हुए।
आचार्य भगवन ने अपने मंगल उद्बोधन में फरमाया कि हम सब मुनिवृंद एक लक्ष्य को लेकर आत्म साधना के लिए विगत छह वर्षों से विहार न कर एक स्थान पर साधना कर रहे हैं, चातुर्मास के पश्चात् चार माह की शीतकालीन व्यक्तिगत साधना होती है, जिसके अंतर्गत चार माह का पूर्णतया मौन रहता है। साधना के लिए अवध निवासियों का भी सहयोग है उनके प्रति हमारा कृतज्ञता का भाव है।
उन्होंने यह भी फरमाया कि ध्यान की विधि जो हमें मिली है उसका उपयोग करें तो जीव का कल्याण होगा। प्रभु की वाणी सुनने से ही जीव का कल्याण होता है सुनकर ही अच्छा-बुरा, हित-अहित, पुण्य-पाप को साधक जान सकता है।
आचार्य भगवन ने 9 नवम्बर 2025 को एक दिवसीय तीन घंटे के ऑनलाईन आत्म ध्यान धर्म यज्ञ में जुड़ने की प्रेरणा दी। ज्ञातव्य है कि श्रमण संघीय महाराष्ट्र प्रवर्तक श्री कुन्दनऋषि जी म.सा. के 92वें जन्म दिवस के उपलक्ष्य में 1 दिवसीय आत्म ध्यान धर्म यज्ञ का आयोजन किया जा रहा है। जो अब तक अहमदनगर में एक, पूना में तीन व उदयपुर (राजस्थान) एक कुल 5 स्थानों पर आयोजित होगा, स्थानों की संख्या और भी बढ़ सकती है। इस धर्म यज्ञ का सीधा प्रसारण आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. के सान्निध्य में सूरत से किया जाएगा।
प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने मन को नियंत्रित करने के लिए ध्यान को जरूरी बताया।
श्री शाश्वत मुनि जी म.सा. ने भी अपने विचार व्यक्त किये। वेसु श्रीसंघ से श्री घनश्याम जी ने भी अपनी भावनाएं व्यक्त की।
इस अवसर पर श्री तुलसी भाई चपलोत, श्रीमती ललिताबेन चपलोत की ओर से श्रीमती मनिषा संचेती, सुश्री ऋजुता एवं अर्हत चपलोत ने भजन एवं वक्तव्य के द्वारा पूज्यवरों के प्रति अपनी भावनाएं व्यक्त की।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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