
आचार्य सम्राट डॉ. शिवमुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि जिस तरह से मिश्री बार-बार खाने से मुंह मीठा हो जाता है उसी तरह से पंचम काल में बार-बार आत्मा की बात कहते हैं, जिससे आत्मा पर श्रद्धा पक्की हो जाए और व्यक्ति आत्मा में स्थित रहने का प्रयास करता रहे। भगवान के समवसरण में सभी तरह के जीव वाणी सुनने के लिए आते हैं तो प्रभु सभी को हे आत्मन! से संबोधित करते हैं। भगवान उनके शरीर को नहीं शरीर के भीतर जीव को देखते हैं।
उन्होंने आगे फरमाया कि जो देहधारी है वह देह एक दिन मिटेगी। घर-परिवार, रिश्ते-नाते यह सब देह के होते हैं। परिवार में रहते हुए कमल के फूल की तरह रहना चाहिए। कमल का फूल कीचड़ में खिलता है किंतु वह कीचड़ से निर्लेप रहता है। उसी तरह एक आत्मार्थी व्यक्ति को परिवार में रहते हुए निर्लेप रहना चाहिए।
उन्होंने राग-द्वेष को मोहनीय कर्म के पहरेदार बताते हुए फरमाया कि व्यक्ति विवाह आदि समारोह में अपने आपको आकर्षक दिखाने के लिए अच्छे वस्त्र, आभूषण धारण करता है और यह भाव रखता है कि उसे कोई देखे और प्रतिक्रिया करे तो उसे वह अच्छा लगता है, किंतु आत्मा को न तो आभूषण चाहिए न कुछ ओर यह क्रिया-प्रतिक्रिया ही बंधन है।
उन्होंने यह भी फरमाया कि जो साधु बनकर भी समाचारी की पालना नहीं करते हैं वे तीन प्रकार के होते हैं जिसमें पहला है जो लज्जावश पालन करते हैं पर भीतर से समाचारी का पालन नहीं करते। दूसरे प्रकार के वे हैं जो समाचारी का पालन नहीं करते वे निर्लिज है, उन्हें लज्जा नहीं है वे अकेले ही रहना पसंद करते हैं।
तीसरे प्रकार के साधु स्वार्थवश, अहंकार के कारण, अपने को उत्कृष्ट बनाए रखने के लिए, अपने को सच्चा साधु दिखाने के लिए, बाहर से समाचारी का पालन करते हैं। यह भी बहुत बड़ी माया है और माया करने से मोहनीय कर्म का बंधन होता है। इसलिए जीवन में सरलजा, ऋजुता, पवित्रता, शुद्धता रहनी आवश्यक है।
प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि संघ के आचार्य सूर्य की तरह होते हैं जो अज्ञान को दूर करने के लिए ज्ञान का प्रकाश देते हैं। आचार्य जब पाट पर विराजमान होते हैं तो साधु-साध्वी, श्रावक-श्राविकाओं में शोभायमान होते हैं।
युवा मनीषी श्री शुभम मुनि जी म.सा. ने ‘पियो प्रेम प्याला, ज्ञान गुण वाला’ सुमधुर भजन की प्रस्तुति दी।
आज की धर्म सभा में बैंगलोर, भीलवाड़ा, राजकोट आदि क्षेत्रों से श्रद्धालुगण उपस्थित हुए।
उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं के साथ ऑनलाईन के माध्यम से अपनी धारणा के अनुसार उपवास, एकासन, आयंलिब आदि का प्रत्याख्यान लिया।
विशेष – एक दिवसीय एवं चार दिवसीय ऑनलाईन आत्म ध्यान साधना शिविर गुरुवार 14 अगस्त 2025 से नाशिक ध्यान केन्द्र एवं आदीश्वर धाम कुप्पकलां (पंजाब) ध्यान केन्द्र पर प्रारंभ होगा। आत्मार्थी साधक इस ऑनलाईन शिविर का निःशुल्क लाभ प्राप्त कर सकेंगे।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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