आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव आचार्य सम्राट डॉ. शिवमुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में उपासकदशांग सूत्र के वांचन में फरमाया कि व्यक्ति धीरे-धीरे, कदम-कदम आगे बढ़ता हुआ वह अपने लक्ष्य तक आगे बढ़ता है, परन्तु कहीं विश्राम न ले। यदि विश्राम भी ले तो आगे बढ़ने के लिए। जैसे पथिक थक जाता है, वृक्ष की छाया तले विश्राम ले लेता है। पक्षी थक जाता है, किसी वृक्ष की टहनी पर बैठ जाता है। मजदूर भार उठाता हुआ थक जाता है, वह भार को रख देता है, किन्तु यह विश्राम विकास के लिए होना चाहिए, विराम के लिए नहीं। जिस व्यक्ति में आलस्य और प्रमाद आता है, वह जीवन आगे नहीं बढ़ पाता।
उन्होंने यौवन, धन, स्वच्छन्दता, अविवेक को पतन का कारण बताते हुए फरमाया कि पहली बात है-यौवन में व्यक्ति को विवेक नहीं होता और वह उन्मत्त बना रहता है। साधु सन्तों के पास आने का मन नहीं करता। सारा दिन ऐसी जुण्डलियों में बैठा रहता है जो उसकी जीवन की घड़ियों को बर्बाद करती हैं और उसे नरक की ओर ले जाती हैं, परन्तु जीवन के दो क्षण वह सन्त-चरणों में अर्पित करने को तैयार नहीं होता। यौवन के बाद धन सम्पत्ति का नशा आता है। जिन्हें दौलत का नशा होता है, वे दूसरों को मक्खी-मच्छर की भांति समझते हैं। बड़े लोग धन सम्पत्ति के नशे में मदहोश हो जाते हैं।
उन्होंने आगे फरमाया कि तीसरा नशा है स्वच्छन्दता। स्वच्छंद का अर्थ है-इंद्रियों का गुलाम। वह भटकता रहता है। तिनका भी आकाश में उड़ता है हवा के ज़ोर से परन्तु उसकी कोई दिशा नहीं होती। वह दिशाहीन होकर उड़ता रहता है। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो इस दुनिया में भटकते रहते हैं। चलना और बात है, भटकना और बात है। चलने वाला धीरे-धीरे भी चले तो गन्तव्य पर पहुंच जाता है पर भटकने वाला कभी अपने लक्ष्य पर नहीं पहुंचता। इन तीनों का निग्रह करने के लिए एक तत्त्व है-विवेक। यदि विवेक भी न हो, अविवेक हो तो ये और भी भयावह हो जाते हैं। यदि इसके साथ विवेक हो तो यौवन को कभी भटकाता नहीं है।
ज्ञान और विवेक का अंतर बताते हुए उन्होंने फरमाया कि एक व्यक्ति को यह ज्ञान रहता है कि क्रोध बुरा है, किन्तु जब कोई क्रोध का कारण बनता है, वह क्रोध में आ जाता है। ज्ञान तो है कि क्रोध के ऐसे-ऐसे परिणाम होते हैं, किन्तु समय पर वह विवेक खो बैठता है। इसका अर्थ यह है कि ज्ञान होने से काम नहीं चलता, समय पर विवेक भी रहना चाहिए। विवेक का अर्थ है-हिताहित की बुद्धि, कि मेरा हित किस में है, अहित किसमें है? यह विचार बना रहे, इस विचार को विवेक कहते हैं। इसलिए जीवन में विवेक जरूरी है।
इससे पूर्व श्रमण संघीय प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने बंध तत्त्व के बारे में फरमाया कि कर्मबंध को कैसे रोका जाए जिससे नये कर्मों का बंधन न हो।
इससे पूर्व मधुर गायक श्री निशांत मुनि जी म.सा. ने ‘‘कुछ पल की जिंदगानी एक रोज सबको जाना, बरसों की क्यों तू सोचे एक पल का नहीं ठिकाना’’ भजन की प्रस्तुति दी।
आज की सभा में दिल्ली, अहमदनगर के श्रद्धालु गुरु दर्शन हेतु उपस्थित हुए।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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