ध्यान गुरु आचार्य सम्राट परम पूज्य शिवमुनि जी म.सा. ने कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर अपने उद्बोधन में फरमाया कि कर्मयोगी, स्थितप्रज्ञ श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व बहुत अनूठा है। कृष्ण ऐसे व्यक्ति हैं जो धर्म की परम गहराइयों और ऊंचाइयों पर होकर भी गंभीर नहीं हैं, उदास नहीं हैं। हंसते व जीवंत धर्म के प्रतीक है कृष्ण। कृष्ण का जन्म अमावस में अंधेरी रात में होता है। असल में जगत की कोई भी चीज उजाले में नहीं जन्मती। एक बीज भी फूटता है तो जमीन के अंधेरे में जन्मता है। एक कविता जन्मती है तो मन के बहुत अचेतन अंधकार में जन्मती है। एक चित्र का जन्म होता है तो मन की बहुत अतल गहराईयों में जहां कोई रोशनी नहीं पहुंचती जगत की, वहां होता है। समाधि का जन्म होता है, ध्यान का जन्म होता है तो सब गहन अंधकार में। गहन अंधकार से अर्थ है जहां बुद्धि का प्रकाश जरा भी नहीं पहुंचता।
उन्होंने फरमाया कि भगवान अरिष्टनेमि के द्वारिका विनाश के बारे में बताने के बाद कृष्ण नगर में घोषणा करवाते हैं, बारह योजन लंबी, नौ योजन चैड़ी देवलोक के समान इस द्वारिका नगरी का सूरा, अग्नि और द्वैपायन ऋषि के हाथों से विनाश होगा अतः द्वारिका नगरी का कोई भी निवासी राजा, युवराज, श्रेष्ठी, रानी दीक्षा लेना चाहे तो कृष्ण वासुदेव की ओर से आज्ञा है। किसी के पीछे यदि कोई उसका संबंधी निराश्रित होगा तो उसकी रक्षा तथा आजीविका का यथोचित प्रबंध किया जाएगा। इसके अतिरिक्त प्रवर्जित होने वाले व्यक्तियों का दीक्षा संस्कार कृष्ण वासुदेव सम्मान पूर्वक समारोह के साथ स्वयं कराएंगे।
उन्होंने आगे फरमाया कि कृष्ण का जीवन बहु-आयामी हैै। कृष्ण का व्यक्तित्व सब रस है। कृष्ण का जीवन सारी दिशाओं को प्रेम को, ध्यान को, योग को एक साथ स्वीकार कर लेता है। कृष्ण इस समग्र जीवन को स्वीकार कर रहे हैं, सुख और दुःख दोनों को भी इसलिए कृष्ण को पूर्ण अवतार कहा है। वे करुणा और प्रेम से भरे होते हुए भी युद्ध में लड़ने की सामथ्र्य रखते हैं। अमृत की स्वीकृति है उन्हें लेकिन जहर से कोई भय भी नहीं है। कठिन है यह बात समझनी कि जीवन के सारे उपद्रव में अलिप्त, जीवन के सारे धूल-ध्वांस के कोहरे और आंधियों में खड़ा हुआ दीया हिलता न हो उसकी लौ कंपती न हो। संबंधों में रहते हुए भी असंग रहा जा सके। हिंसा की तलवार हाथ में हो तो भी प्रेम का दीया मन से न बुझे। कृष्ण का जीवन पूर्ण स्वतंत्र जीवन है जिसकी कोई सीमा नहीं जो कहीं भी जा सकता है। ऐसी कोई जगह नहीं आती जहां वे भयभीत हों और कदम को ठहराएं। कृष्ण का व्यक्तित्व पाॅजिटिव है।
कृष्ण का जीवन कहता है कमजोर का साथ दो। कृष्ण ने गरीब सखा सुदामा हो या षड्यंत्र का शिकार पांडव श्री कृष्ण ने हमेशा उन्हें मुसीबत से उबारा। व्यक्तिगत जीवन में हमेशा सहज व सरल बने रहो। शक्तिशाली होते हुए भी कृष्ण को न तो युधिष्ठिर का दूत बनने में संकोच हुआ, न अर्जुन का सारथी बनने में।
इससे पूर्व श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा ने अपने उद्बोधन में देवगति के जीवों की चर्चा करते हुए फरमाया कि हम देवों को सुखी मानते हैं, देव सुखी नहीं है। देवों को क्षेत्र की अपेक्षा से अनुकूलता है। अनुकूलता में सुख नहीं है, अनुकूलता पुदगलों की है। किसी भी गति में सुख नहीं है किसी भी जाति, लिंग में सुख नहीं है। जिस स्थिति में स्वयं में रहोगे उस समय सुख रहेगा वह शाश्वत सुख है जो हमेशा रहेगा।
आज की सभा में श्री शमित मुनि जी म.सा. ने ‘‘नहीं है भरोसा जरा जिन्दगी का’’ भजन की प्रस्तुति दी।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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