जीवन के सभी व्यवहारों में समभाव से चलना चाहिए |

10 NOVEMBER 2024

आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव आचार्य सम्राट डॉ. शिवमुनि जी म.सा. ने अपने दैनिक उद्बोधन में उपाशकदशांग सूत्र की वांचना करते हुए फरमाया कि भगवान महावीर के एक लाख उन्नसठ हजार श्रावक थे जिसमें मुख्य दस श्रावकों का ही वर्णन किया गया है, उन दस श्रावकों में कुण्डकौलिक श्रावक जब उपासना करता है तो उस समय देव उसकी परीक्षा लेने के लिए उसके वस्त्र उठा लेता है फिर भी वह विचलित नहीं होता किंतु वह दृढ़ रहता है। इसी प्रकार जो श्रावक सामायिक करते समय जब वस्त्र परिवर्तन करते हैं उस समय वे वस्त्रों के प्रति मोह छोड़ देते हैं, वस्त्रों से अलग हो जाते हैं।

उन्होंने आगे उद्बोधन में फरमाया कि आपको सामायिक में भी समता रखनी है और जीवन के अन्यान्य व्यवहारों में भी समभाव से चलना है। तभी आप पूर्णता के शिखरों तक पहुंच सकेंगे। यदि कुण्डकौलिक की भांति आपके जीवन के आदि, मध्य और अंत में समता बनी रहे और संसार की कोई शक्ति आपको समता से विचलित न कर सके, यह आपकी दृढ़ता आपकी स्वरूप प्रतिष्ठा है। मोक्ष जाने के लिए सत्य पर श्रद्धा होनी चाहिए। जो व्यक्ति धर्म से जुड़ जाता है वह सुरक्षित रहता है। मुख्यतया धर्म है। धर्म की अपनी-अपनी परम्परा है, क्रिया काण्ड में धर्म नहीं है धर्म अंदर से आता है। भगवान महावीर की साधना साढे बारह वर्ष में अनेकों उपसर्ग आये वे अपने धर्म में स्थित हो गये थे।

उन्होंने फरमाया कि शरीर में आत्मा के विद्यमानता है तभी शरीर संचालित होता है आत्मा के बिना आंख भी देख नहीं सकती, हाथ भी हिल नहीं सकता।

इससे पूर्व श्रमण संघीय प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि अनुप्रेक्षा से संवर, अनुप्रेक्षा से वैराग्य का भाव पैदा होता है। राग मोह का कारण है। राग का भाव संसार, आश्रव का कारण है। अनित्य अनुप्रेक्षा की बारह भावनाएं है। अगर सुखी होना है तो राग-द्वेष का छेदन करो। विषयों की कामनाओं का त्याग करना होगा।

इससे पूर्व श्रमण संघीय सहमंत्री श्री शुभम मुनि जी म.सा. ने ‘जिंदगी में हजारों से मेला जुड़ा, हंस जब-जब उड़ा वो अकेला उड़ा’’ एवं प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी म.सा. ‘‘आया कहां से कहां है जाना है, ढूंढ ले ठिकाना चेतन ढूंढ ले ठिकाना’’ भजन की प्रस्तुति के साथ अपना उद्बोधन दिया।

आज की सभा में बीड़, औरंगाबाद, बैंगलोर, पूना, नाशिक, उदयपुर, सूरत आदि जगहों से श्रद्धालु गुरु दर्शन हेतु उपस्थित हुए।

- आचार्य शिवमुनि

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