

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर ध्यान गुरु आचार्य सम्राट डॉ. शिव मुनि जी म.सा. ने फरमाया कि जीवन का लक्ष्य क्या होना चाहिए? संसारी व्यक्ति का क्या लक्ष्य होता है? उन्होंने फरमाया कि अधिकतर संसारी लोगों का लक्ष्य यही होता है कि बच्चा बड़ा हो जाए अच्छी स्कूल में पढ़ाई करे और अच्छी नौकरी लग जाए, यह सारा व्यक्तित्व का पोषण है।
उन्होंने फरमाया कि साधकों को भेद ज्ञान की साधना मिल गई। जिसमें साधक का लक्ष्य स्व में स्थित होने का, क्षायिक सम्यक्त्व का है। भगवान की वाणी के अनुसार जीवन का लक्ष्य यह है कि नये कर्म का बंधन न हो, अनादि काल से अंनत कर्म पड़े हैं वे क्षय होते रहें। इसके लिए व्यक्ति सबसे पहले स्वयं को केन्द्र बिन्दू बना ले। जैसे परीक्षार्थी परीक्षा के समय उसका लक्ष्य यही होता है कि प्रश्न पत्र में प्रश्नों का उत्तर अच्छी तरह से दूं इसके लिए पहले से ही तैयारी करता है। इसी प्रकार जीव को केन्द्र बिन्दू बना लेना चाहिए।
उन्होंने आगे फरमाया कि अनंत पुदगलों के बने संसार में कोई भी पुद्गल को महत्त्व देने जैसा नहीं है। जीव किसी भी पुद्गल के लिए अपने को गौण नहीं करे। क्योंकि व्यक्ति के पास अष्टगुणों की संपदा है इसलिए उसे पुद्गलों की जरूरत ही नहीं है। पुद्गलों का आकर्षण दुनियाभर में है। किसी को धन चाहिए, किसी को पद प्रतिष्ठा, किसी को नया घर बनाना, किसी को देश-विदेश में घूमना है, हर जीवात्मा में अष्टगुण विद्यमान हैं उसे प्रकट होने दें। अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत सुख, अनंत शक्ति उसके पास है। व्यक्ति एक लक्ष्य बना ले कि उसे स्वयं को एक घड़ी तक स्थिर करे फिर एक घड़ी के पार जाना है। एक घड़ी में क्षायिक समकित हो जाएगी। एक घड़ी का क्षायिक समकीत हो गया तो फिर मोह कर्म टूट जायेगा।
इससे पूर्व श्रमण संघीय प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने तत्वार्थ सूत्र वांचन में दिशा परिमाण व्रत, उपभोग-परिभोग व्रत एवं अनर्थ दण्ड की चर्चा करते हुए फरमाया कि भोग-उपभोग परिमाण जो वस्तुएं उपयोग में आती है, पेय में, पकाये हुए भोजन में क्या लेना है अपनी भावना के अनुसार इन सबमें जीवन पर्यंत व दैनिक मर्यादा कर सकता है। इसके अलावा घर के बाहर जाते समय वाहन आदि की मर्यादा करता है, पांव में चप्पल आदि पहनने की मर्यादा करता है। एक साधक के लिए इसलिए जरूरी है जिससे उसका मन भटके नहीं और वह अपनी साधना में आगे बढ़ता रहे। मन वचन काया की भटकन को रोकने लिए मर्यादा आवश्यक है।
प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी म.सा. ने ‘‘पाना नहीं जीवन को बदलना है साधना’’ भजन की प्रस्तुति दी।
आज शौकीन जी पोखरणा एवं ज्योतिजी मेहता ने नौ आयंबिल का प्रत्याख्यान लिया।
आज अखिल भारतीय व्यापार परिसंघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री सत्यभुषण जैन, जोधपुर से प्रसिद्ध ज्योतिष बाबा व्यास गुरु दर्शन हेतु उपस्थित हुए जिनका शिवाचार्य आत्म ध्यान फाउण्डेशन की ओर माला, शाॅल एवं स्मृति चिन्ह द्वारा स्वागत सम्मान किया। इसके अलावा बैंगलोर, राजस्थान आदि जगहों से गुरु दर्शनार्थ श्रद्धालु उपस्थित हुए।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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