


आचार्य भगवन ने आत्म कल्याण के लिए जीवन के लक्ष्य को निर्धारित करने की प्रेरणा प्रदान की और फरमाया कि आत्मा के प्रति अटूट श्रद्धा होनी चाहिए। जिस प्रकार कामदेव श्रावक, सेठ सुदर्शन, गजसुकुमाल आदि अनेक ऐसे आत्मार्थी हुए हैं जिन्होंने केवल अपनी आत्मा पर अटूट श्रद्धा की और इस भव सागर से पार हो गए।
उन्होंने फरमाया कि व्यक्ति स्नान करते हुए, भोजन करते हुए, प्रतिष्ठान पर व्यापार करते हुए एकत्व की भावना रहे कि जो भी कार्य कर रहा है वह शरीर कर रहा है मैं अपनी आत्मा में स्थित हूं, मैं अकेला हूं इस भावना से व्यक्ति धीरे-धीरे आत्मा के निकट पहुंच जाता है।
उन्होंने फरमाया कि व्यक्ति को परिवार में भी अपनी जिम्मेदारियों को निभाते हुए परिवार से ज्यादा मोह न हो कि जिससे आत्मा से दूर हो जाए और मोह में ज्यादा फंस जाए। ज्यादा मोह दुःखदायी है।
उन्होंने आचार्य सम्राट पूज्य श्री आत्माराम जी म.सा. के अवदानों को संस्मरण करते हुए फरमाया कि आचार्य श्री आत्मारामजी म.सा. ने अनेक संस्कृत और प्राकृत आदि भाषाओं में टिकाएं लिखी। उनके ग्रंथों और टिकाओं को पढ़ने से आत्म बोध की सीख मिलती है।
प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने उद्बोधन में मन को कर्म बंधन का कारण बताया।
युवामनीषी श्री शुभम मुनि जी म.सा. ने ‘’गुरु की कृपा बिन मिले ना किनारा, गुरु का सहारा, गुरु ही हमारा’’ सुमधुर भजन की प्रस्तुति दी।
आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. के सान्निध्य में अनेक जगहों से संघ क्षमापना एवं गुरु दर्शन हेतु उपस्थित हो रहे हैं, आज महावीर भवन भटार रोड महिला मण्डल संघ गुरु दर्शन हेतु उपस्थित हुआ। सिरसा से श्री मोहित जैन परिवार सहित उपस्थित हुए।
विशेष – आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. के आगामी 18 सितम्बर 2025 को 84वें जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में श्री ऑल इण्डिया श्वेताम्बर स्थानकवासी जैन कॉन्फ्रेंस राष्ट्रीय महिला शाखा नई दिल्ली द्वारा 84 हजार एकासन के संकल्प पत्र तैयार किये गये है। जिसके तहत देशभर के श्रावक-श्राविकाएं एकासन तप द्वारा जन्मोत्सव मनाएंगे।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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