जैन धर्म का मूल सिद्धांत है शरीर और आत्मा का भेद |

26 JULY 2025

आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. ने श्री आचारांग सूत्र की चर्चा करते हुए अपने उद्बोधन में फरमाया कि चाहे मुनि हो या आत्मार्थी साधक भगवान का मार्ग सबके लिए खुला है, यह राजमार्ग है, हम सभी साधक हैं कोई छोटा-बड़ा नहीं है जिन षासन का एक ही मार्ग है। व्यक्ति चाहे कहीं भी रहे यदि इस मार्ग पर चलता है तो वह आगे जाकर सिद्धगति को प्राप्त करता है। षरीर की प्रणति शमशान की राख के बराबर है। मूल्य तो चेतना का है, किंतु व्यक्ति उसे भूल रहा है। शरीर की हर क्रिया में उठते-बैठते, चलते-फिरते, भोजन करते, सोते हर समय आत्मा का ध्यान रहे। जैन धर्म का पहला सिद्धांत ही है जड़ जीव का भेद।

उन्होंने गजसुकुमाल मुनि के दृष्टांत का उल्लेख करते हुए फरमाया कि गजसुकुमाल मुनि का बहुत कोमल शरीर था। गजसुकुमाल दीक्षा लेकर शमशान में चले गये, मुनि बनने के बाद पुराना ऐसा भारी कर्म आया कि उनके पास सोमिल ब्राह्मण आया और कहा कि तू मेरी बेटी को छोड़कर ढोंगी बन गया है, उसने जलती हुई चिता के अंगारे गजसुकुमाल के सिर के उपर डाल दिये, लेकिन गजसुकुमाल 48 मिनिट तक स्थिर खड़े रहे, सारे कर्म क्षय कर लिये। भगवान महावीर भी दो-दो, तीन-तीन, चार-चार महीने तक खड़े रहकर तपस्या की, इस दृश्टांत से साधक को सार ग्रहण करना चाहिए। जैन दर्शन का सिद्धांत कहता है कि षरीर भूल जाओ। आत्मा निकलने के बाद षरीर का कोई महत्त्व नहीं है। तीन समय में अर्थात पलक झपकते ही आत्मा षरीर से चली जाती है इतनी तेज गति होती है।

प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने श्रीदषवैकालिका सूत्र के अश्ठम अध्ययन के सूत्र वांचना करते हुए फरमाया कि व्यक्ति चाहे छोटो हो या बड़ा किसी का उपहास नहीं करना चाहिए। साधु बनकर यदि उपहास करते हैं तो महान असातना करके अधोगति का कर्म बंधन होता है। जो सच्चा त्यागी संत होता है वह आत्मा से परमात्मा की ओर आगे बढ़ता है। अभेद दृश्टि से सब जीव समान है किंतु व्यक्ति को भाव हिंसा के बारे में भी चिंतन करना चाहिए कि कहीं वह द्रव्य हिंसा से ज्यादा भाव हिंसा तो नहीं कर रहा है।

उन्होंने आगे फरमाया कि आचार्य भगवन ने आज से 30 वर्श पूर्व ही बता दिया कि आने वाला समय जिनषासन का है जो यूएनओ द्वारा ध्यान को विष्व में ध्यान दिवस के रूप में घोशित कर दिया, योग दिवस घोषित कर दिया। भगवान महावीर ने शरीर और आत्मा का भेद कर आत्मा को जोड़़ने के लिए ध्यान और योग का महत्त्व बताया था, जिसकी आज सबको जरूरत है।

युवामनीषी श्री शुभम मुनि जी म.सा. ने ‘आत्म चदरिया मैली न होय, वीर जपो महावीर जपो’ समधुर भजन की प्रस्तुति दी।

ऑनलाईन के द्वारा मुंबई से नमन हितेश मेहता ने आज 17 उपवास के प्रत्याख्यान लिये, साथ अनेक श्रावक-श्राविकाओं ने प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से धारणानुसार तपस्याओं के प्रत्याख्यान लिये।

आज की धर्म सभा में सिरसा, मंगलदेष, जम्मू, दिल्ली आदि अनेक क्षेत्रों से श्रद्धालुगण आचार्य भगवन के दर्षनार्थ उपस्थित हुए। श्री अशोक मेहता ने आए हुए अतिथियों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की।

- आचार्य शिवमुनि

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