




श्रमण संघ के चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट अध्यात्म ज्योति डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. एवं ज्योतिपूंज तेरापंथ के आचार्य श्री महाश्रमणजी का आध्यात्मिक मिलन सिटी लाईट स्थित तेरापंथ भवन सूरत में हुआ। दोनों आचार्यों के इस मंगल मिलन के ऐतिहासिक दृश्य को निहारने के लिए जैसे पूरा
सूरत शहर उमड़ पड़ा। आध्यात्मिक मंगल मिलन पर आचार्य सम्राट डॉ. शिवमुनिजी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि आचार्य महाश्रमणजी की सरलता, ऋजुता, आत्मीयता प्रेम व अंतःकरण की भावना हमें यहां खींच लाई इसलिए हम यहां आए और मिलन हुआ। हम एक वृक्ष की दो शाखा के समान हैं।
उन्होंने आगे फरमाया कि साधु कौन होता है? जो निग्रंथ, सरल, ऋजु है वही साधु होता है। हम सभी धर्म से जुड़े हुए हैं। साधु-साध्वी, श्रावक-श्राविका ये चारों तीर्थ है जो तीर्थंकरों ने बनाया जो तिरने योग्य है, तारने योग्य है। चार गति चौरासी लाख जीव योनि में हम सभी अनेक बार भटके इससे पार जाने के लिए हमें वही मार्ग लेना है जो केवलियों ने तीर्थंकरों ने लिया।
उन्होंने आगे फरमाया कि भगवान महावीर की साधना आत्मा की साधना है। जो जड़ जीव का भेद किये बिना संभव नहीं हो सकती। बारह प्रकार के तपों में सबसे बड़ा तप आत्मा से जुड़ना है। जैसे किसी व्यक्ति को नींद आती है वह कमरे की लाईट बंद करता, बिस्तर लगाता है वह एक सोने के लिए उपक्रम किया। सोना अलग है नींद की तैयारी अलग है इसी प्रकार जब ध्यान करते समय ‘श्वास’ ‘सोऽहम’ का सहारा लिया जाता है जब सोऽहम में डूबते हो तो जीव में स्थित हो जाते हो वह ध्यान है, नींद
मूर्च्छा है, ध्यान जागरूकता है। इससे पूर्व आचार्य श्री महाश्रमणजी ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि हर व्यक्ति मंगल की
प्राप्ति के लिए अनेक रूपों में प्रयास करता है। चातुर्मास की सम्पन्नता के बाद प्रस्थान भी मुहूर्त के आधार पर होता है। दीक्षा के बाद अनुशासन का ओज आहार दिया जाता है ये सारे छोटे प्रयास हैं, किंतु मंगल के लिए सबसे बड़ा प्रयास है धर्म की आराधना। धर्म ही उत्कृष्ट मंगल है। धर्म वह है जिसमें अहिंसा, संयम, तप है। व्यक्ति चाहे किसी जाति सम्प्रदाय का हो जो अहिंसा,
संयम, तप की आराधना करता है वह मंगल को प्राप्त करता है। जिसका मन सदा धर्म में रमा रहता है उसे देव भी नमस्कार करते हैं।
आचार्य श्री महाश्रमण जी ने पूर्व संस्मरणों की चर्चा करते हुए फरमाया कि आचार्य श्री शिवमुनि जी म.सा. में मिलनसारिता है वात्सल्य भाव है। आचार्य श्री शिवमुनि जी से मिलने के लिए चातुर्मास के बीच में जाना संभव नहीं था। चातुर्मास संपन्नता पर आज हमारा मिलन हो रहा
है। श्रमण संघीय प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा.ने मिथ्यात्व और मोह को त्यागने की प्रेरणा प्रदान की।
श्रमण संघीय सहमंत्री श्री शुभममुनि जी म. सा. ने “शिवाचार्य महाश्रमणाचार्य का मिलन सुधा बरसाएं नव इतिहास बनाएं” सुमधुर भजन की प्रस्तुति दी।
मुख्य मुनि महावीर कुमार जी ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि आचार्य स्वयं तरते हैं और दूसरों को भी तारने वाले होते हैं।
कार्यक्रम का संचालन मुनि कुमार श्रमणजी ने किया।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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