श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट डॉ. शिव मुनि जी म.सा. ने दैनिक प्रवचन में फरमाया कि यदि सुनोगे नहीं तो जानोगे कैसे? सुनना भी कला है, देखने से ज्यादा सुनने का महत्त्व अधिक होता है। व्यक्ति अपने वृद्ध माता की बात ध्यान से सुनता है तो उन्हें अच्छा लगता है। जिस तरह से एक मरीज की बात डॉक्टर ध्यान से सुनता है, सांत्वना देता है तो मरीज की बीमारी कुछ हद तक डॉक्टर के सुनने से चली जाती है, घर परिवार, समाज की हर बात को सुनना चाहिए और उसका समाधान करना चाहिए। भगवान की वाणी में सुनने को अधिक महत्त्व दिया गया है। प्रभु की वाणी श्रवण करने से व्यक्ति मोक्ष प्राप्ति की ओर आगे बढ सकता है।
आचार्य श्री जी ने धर्म श्रवण का लाभ बताते हुए फरमाया कि जिनवाणी श्रवण करने से ज्ञान की प्राप्ति होती है। ज्ञान से विज्ञान। विज्ञान होने पर अर्थात ्विवेकदृष्टि जागृत होने पर दुष्कृत्य का प्रत्याख्यान होता है। प्रत्याख्यान के फलस्वरूप संवर की प्राप्ति होती है, क्योंकि प्रत्याख्यानी जीव आस्रव को रोक देता है। आस्रव का निरोध करने से तीर्थंकर की आज्ञा का आराधक होता है। आराधक होने से तप की प्राप्ति होती है। तप के प्रभाव से कर्म कटते हैं। कर्म कटने से अक्रियावान् अर्थात् स्थिर योगी और सब पापों से रहित होता है। सब पापों से रहित होने पर सिद्धि अर्थात् मुक्ति मिलती है।
उन्होंने यह भी फरमाया कि अनेक युवाओं में नशे की लत है जो स्वास्थ्य के लिए विपरीत प्रभाव डालती है। नशा चाहे कोई भी हो उसकी लत सबसे खराब होती है कि वह उसके बिना रह नहीं सकता, इसलिए नशे की लत से बचना चाहिए।
इससे पूर्व श्रमण संघीय प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि जो व्यक्ति माया करता है, सरल और ऋजु नहीं है वह तिर्यंच गति का बंध करता है इसलिए जीवन में सहजता सरलता को अपनाना चाहिए। नरक के आयुष्य से बचना है तो परिग्रह, ममत्व आसक्ति नहीं रखनी चाहिए परिणामों की शुद्धि रखनी चाहिए। यदि पुण्य उदय से धन आया है तो उस पर मेरेपन का भाव नहीं रखना चाहिए, जहां धन की जरूरत होगी वहां उस कार्य में लग जाएगा मैं इसमें कहीं कर्ता – भोक्ता नहीं हूं इस प्रकार का भाव रखने वाले व्यक्ति को आश्रव बंधन नहीं होता।
इससे पूर्व प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी म.सा. ने ‘‘हमें ज्ञान देकर, हमें ध्यान देकर जीना सिखाते हैं गुरुवर हमारे’’ भजन की प्रस्तुति दी।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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