




‘‘सत्य ज्ञान है। ज्ञान के द्वारा व्यक्ति मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। ज्ञान आत्मा का स्वभाव है। ज्ञान से ही व्यक्ति इस संसार को माया जाल समझता है और आगे बढ़ जाता है। जो जीव और अजीव को नहीं जानता तो वह ज्ञानी, साधक और संयमी नहीं हो सकता।’’ उपरोक्त विचार आचार्य सम्राट डाॅ. शिवमुनि जी म.सा. ने पर्युषण पर्व के छठेे दिन अवध संगरीला परिसर के बैक्विट हाॅल में उपस्थित धर्म सभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किये।
उन्होंने फरमाया कि श्रमण वही है जिसके भीतर शांति और समता है। जो समता व ब्रह्म से युक्त है वह ब्राह्मण है। ज्ञान से मुनि होता है, तप से तापस होता है। ज्ञान से परम सुख की प्राप्ति होती है।
ज्ञानी व्यक्ति के लक्षणों की व्याख्या करते हुए फरमाया कि ज्ञानी व्यक्ति क्रोध नहीं करता कभी क्रोध आता भी है तो वह पानी की लकीर की तरह क्षणिक आता है तो क्षमा मांग लेता है। क्रोध आता है तो शांत हो जाता है। क्षमा वीर का आभूषण है, परिवार समाज, राष्ट्र में परिस्थितिवश कोई घटना घट जाती है व्यक्ति उलझ जाता है उस समय सशक्त होते हुए क्षमा कर देते हैं।
उन्होंने फरमाया कि जैसे सुई में धागा पिरोया हुआ नहीं होने पर सूई ढूंढने पर आसानी से नहीं मिलती, यदि सुई में धागा पिरोया हुआ है तो सुई आसानी से मिल जाती है वैसे ही आत्मा को ज्ञान से बांधना है। वैसी ही ज्ञान रूपी पिराई हुई आत्मा संसार सागर से पार कर सकती है।
इससे पूर्व श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा ने अंतकृतदशांग का वांचन करते हुए फरमाया कि बंधन का मूल कारण मन, वचन और काया का योग है। जब ये चंचल रहते हैं, हम इनके वशीभूत हो जाते हैं, इनके दास बन जाते हैं तो ये हमारे कर्म संसार को बढ़ाते हैं। मन के उपर लगाम है तो यदि धर्म के अनुकूल चिंतन है तो उसका सहयोग देता है और यह धर्म के विपरित पुदगल में, पर चिंतन में, विभाव में जा रहा है तो वह संसार से भटका रहा है उसी समय होश पूर्वक मन पर लगाम लगाता है। जिन्होंने मन, वचन काया को अनुशासित किया वे साधना करके साधु बन गये और सिद्ध बुद्ध मुक्त हो गये। जो मन, वचन काया, पांचों इन्द्रियों के दास बन गये वे संयम से गिर गये और चार गति चैरासी लाख गति में भ्रमण करते रहेंगे।
आज की सभा में श्री शमित मुनि जी म. सा. ने ‘‘झूठा जग सपना, कोई नहीं अपना प्रेरणा यह लाया पर्व पर्युषण आया है’’ भजन प्रस्तुत करते हुए अंतकृतदशांग सूत्र का मूल वांचन किया।
इस अवसर पर प्रत्यक्ष और परोक्ष में कई श्रावक-श्राविकाओं ने एकासन, आयंबिल, उपवास आदि तप के प्रत्याख्यान लिये।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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