


‘खामेमि सव्वे जीवा, सव्वे जीवा खमंतु मे’’ सभी प्राणियों के साथ मेरी मैत्री है, किसी के साथ मेरा वैर-विरोध नहीं है, इन शब्दों के साथ क्षमा मांगने से ज्यादा जरूरी है क्षमा करना। पर्युषण पर्व के अंतिम दिन क्षमा वाणी दिवस (मैत्री दिवस) पर सभी एक दूसरे से ‘मिच्छामी दुक्कड़म’ मन, वचन, काया से जाने-अनजाने में हुई गलतियों या किसी को कोई कटु शब्द बोल दिया हो तो उसके लिए हाथ जोड़कर एक दूसरे से क्षमा-याचना की जाती है जिसका जैन धर्म में विशेष महत्त्व है।
मैत्री दिवस पर श्रमण संघ के चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट डाॅ. शिवमुनि जी म.सा. ने सभी जैन आचार्यों, छोटे-बड़े साधु-साध्वी, श्रावक-श्राविकाओं, जीव जगत के छोटे-बड़े सभी प्राणियों के प्रति मन, वचन, काया से क्षमायाचना करते हुए अपने उद्बोधन में फरमाया कि यदि आप सरल और ऋजु बनोगे तो महाविदेह में जाओगे, यदि मन छल-कपट रह गया तो पांच ऐरावत मिलेंगे। यदि महाविदेह में प्रभु के पास जाना है तो ऋजुता, सरलता, पवित्रता जरूरी है। जब व्यक्ति के भीतर प्राणी मात्र के प्रति मंगल की भावना, करूणा की भावना, मैत्री की भावना होती है तो क्षमा याचना करनी चाहिए। इस जगत में असंख्य जीव हैं जाने-अनजाने पूर्व भव में व्यक्ति का कब क्या रिश्ता नाता रहा होगा उनसे भी क्षमा मांग लेनी चाहिए।
उन्होंने फरमाया जब व्यक्ति विभाव में होता है तो कर्मों का बंधन होता है। जब जीव इस जड़ से, शरीर से जुड़ता है तो विभाव अवस्था में होता है उस अवस्था में इन्द्रियों के साथ जुड़कर ममत्व का भाव रहता है उसे तोड़कर स्वभाव में आएं। क्षमा व्यक्ति का स्वभाव और मैत्री की भावना है जिसका प्रतिपल प्रतिक्षण प्रयास करते रहना चाहिए।
इससे पूर्व श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा ने श्रमण संघ के सभी साधु-साध्वियों के प्रति पत्र-लेखन संबंधी क्षमा याचना करते हुए अपने उद्बोधन में फरमाया कि व्यक्ति के स्वभाव में आने की प्रथम कसौटी है कि उसके भीतर जो अहंकार, छल-कपट, द्वेष भावना की गांठ बंधी होती है वह खुल जाती है और वह अंतःकरण से क्षमा मांग लेता है। धर्म की शुरूआत क्षमा से होती है। धार्मिक व्यक्ति के दस लक्षण अर्थात् दस गुणों में क्षमा को पहला गुण बताया गया है।
आज की सभा में श्री शमित मुनि जी म. सा. ने अपने उद्बोधन में पारिवारिक शांति के लिए क्षमा याचना का महत्त्व बताया।
श्री निशांत मुनि जी म.सा. ने क्षमा प्रेम अपनाना है, क्षमा पर्व मनाना है’’ श्री शाश्वत मुनि जी म.सा. ने ‘औरों की बात छोड़ो, खुद को जरा टटोलो लेकर क्षमा का साबुन निज आत्मा को धो लो’’ भजन की प्रस्तुति दी।
मैत्री दिवस पर देशभर से आए श्रावक-श्राविकओं ने पूज्य आचार्य सम्राट डाॅ. शिवमुनि जी म.सा. आदि ठाणा से क्षमायाचना करते एक-दूसरे से क्षमा याचना की।
इस अवसर पर प्रत्यक्ष और परोक्ष में कई श्रावक-श्राविकाओं ने एकासन, आयंबिल, उपवास आदि तप के प्रत्याख्यान लिए।
कार्यक्रम का संचालन फाउण्डेशन के उपाध्यक्ष श्री अशोक मेहता ने किया।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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