श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट डॉ. शिव मुनि जी म.सा. ने दैनिक प्रवचन में फरमाया कि यदि मृत्यु नहीं होती तो धर्म की शुरूआत नहीं होती। मृत्यु का भय व्यक्ति को धर्म की ओर ले जाता है। मृत्यु किसी को नहीं छोड़ती है, जिसने मृत्यु को स्वीकार कर लिया वह विराधक से आराधक हो जाता हैं। जैसे सोने को पहले कसौटी पर कसा जाता है, फिर काटा जाता है, फिर उसे आग की आँच में तपाया जाता है और नरम बनाकर उसे पीटा जाता है उसके बाद ही खरा सोना सिद्ध होता है।
उन्होंने आगे फरमाया कि सच्चे साधक को भी विविध प्रकार के संकट उसे कसौटी पर कसते हैं, फिर उसके शरीर और शरीर से सम्बन्धित इष्ट एवं प्रियजनों से वियोग कराया जाता है, तत्पश्चात् उसकी आत्मा को कषायों और विषयों की आग में, राग-द्वेष-मोह की आंच में तपाया जाता है और अत्यन्त नरम बनाकर उसे पीड़ित किया जाता है, सांसारिक सुख सामग्री या व्यवसाय में आर्थिक हानि के कारण लुट-पिट जाता है। सच्चा साधक साधना की इन परीक्षाओं के दौरान सावधान होकर चलता है और संलेखना-संथारा करके समभाव-समाधिभावपूर्वक मृत्यु का वरण करता है और ऐसी महापरीक्षा में सफल होता है।
उन्होंने प्रदेशी राजा के प्रसंग का उल्लेख करते हुए फरमाया कि प्रदेशी राजा के पूर्वजीवन में हत्या, अत्याचार, क्रूरता, आदि प्रविष्ट हो गए थे। शासक होने का अभिमान भी था। किन्तु जब श्री केशीकुमार श्रमण के सम्पर्क में आकर उसने जीवन और मरण की कला का पाठ पढ़ा, शरीर की नश्वरता और आत्मा की अजर-अमरता का वास्तविक बोध मिला, वह प्रबुद्ध हो गया। अनासक्त भाव से जीवनयापन करने लगा, जीवन और मरण से निरपेक्ष होकर एवं सांसारिक सुख-भोगों से विरक्त होकर वह अपनी साधना में रत हो गया।
इसी दौरान प्रदेशी राजा की साधना की अन्तिम परीक्षा हुई। रानी सूर्यकान्ता ने उसे भोगों में आकर्षित करने की बहुत कोशिश की, जब वह भोगों के सम्मुख न हुआ तो रानी ने अपने मार्ग में काँटा समझकर भोजन में विष-मिश्रण करके राजा प्रदेशी को समाप्त करने का निश्चय कर लिया। राजा ने जब भोजन का ग्रास मुँह में लिया, तभी वह समझ गया कि यह भोजन विषमिश्रित है। उसने रानी को दोष न देकर अपने पूर्वाेपार्जित कर्मों को ही इसके लिए उत्तरदायी ठहराया। विष ने अपना काम किया ही। राजा ने विषाक्त भोजन करते ही जीवन का अन्त निकट जानकर संलेखना-संथारा अंगीकार कर लिया। न उन्हें जीवन के प्रति मोह रहा, न मृत्यु के प्रति घृणा या शोक! न किसी प्रकार की सांसारिक सुख-भोगों की स्पृहा रही, न अपने किसी स्वजन सम्बन्धी के प्रति आसक्ति या घृणा (राग-द्वेष) मन में आयी। न अपनी साधना के प्रतिफल के रूप में किसी पदार्थ की इच्छा रही। राजा प्रदेशी मृत्यु के साथ हँसते-हँसते समाधिमरण पूर्वक इस संसार से विदा हुए। राजा प्रदेशी साधना की इस अन्तिम परीक्षा में उत्तीर्ण हुए। मृत्यु की कला में सफल हुए।
इस प्रकार कई साधक जीवन के पूर्वार्द्ध में जीवन कला में सिद्धहस्त एवं सफल दिखाई देते हैं, अपने पिछले अशुभ जीवन को आलोचना, पश्चात्ताप, गर्हा और प्रायश्चित्त द्वारा, तथा कषाय और शरीर की संलेखना की आग में झोंक कर सौ टंच सोने-सा शुद्ध बना लेते हैं और प्रसन्नतापूर्वक समाधिमरण के सहित मृत्यु का सहर्ष आलिंगन करते हैं। वे मृत्यु को पराजित कर देते हैं, मृत्यु उन्हें पराजित नहीं कर पाती अर्थात् वे अपनी अन्तिम परीक्षा में सफल हो जाते हैं।
इससे पूर्व श्रमण संघीय प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में चारित्र मोहनीय कर्म बंधन का कारण बताते हुए फरमाया कि चारित्र मोहनीय कर्म के कारण जीवन में संयम नहीं आता है। चारित्र मोहनीय में कषाय तीव्र होने के कारण परिणाम बिगड़ते हैं जिससे चारित्र मोहनीय कर्म का बंध होता हैं। व्यक्ति में जब क्रोध का उदय होता है तो सामने परिस्थिति को निमित्त बनाकर परिणाम खराब करते हैं। व्यक्ति क्रोध के कारण भीतर में परिणाम खराब करता है, इसलिए शांत जीवन के लिए प्रतिकूल परिस्थिति होने पर भी उसे समभाव से सहन करते हुए क्रोध को क्षय कर सकते हैं।
इससे पूर्व मधुर गायक श्री निशांत मुनि जी म.सा. ने ‘‘जिंदगी में सदा मुस्कुराते रहो, फासले कम करो दिल मिलाते रहो’’ भजन की प्रस्तुति दी।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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