केवलज्ञान में बाधक है - अहंकार |

5 SEPTEMBER 2024

आचार्य सम्राट डाॅ. शिवमुनि जी म.सा. ने पर्युषण पर्व के पांचवे दिन अपने उद्बोधन में फरमाया कि व्यक्ति बाहर यात्रा करते समय यात्रा की मंगल कामना चाहता है, अन्य सांसारिक कार्यों के लिए भी मंगल चाहता है उसके लिए मंगल कामना करता है। इसी तरह अपनी आत्मा के कल्याण के लिए मंगल सोचना चाहिए उसके लिए आवश्यक है अहंकार, ममकार का त्याग करना।

उन्होंने फरमाया कि शरीर के ममत्व अर्थात् मोह को तोड़ने के लिए व्यक्ति को अपने प्रति होश बना रहे, आत्मा के प्रति सजग रहे। जब व्यक्ति को होश छूट जाता है तो वह पर चिंतन में चला जाता है पर चिंतन से मोह कर्म का बंधन होता है। आत्मा के प्रति जागृत रहते हुए केवल अपनी आत्मा का चिंतन, उसके सिवाय कुछ भी चिंतन नहीं करना चाहिए। श्रावक को हर कार्य यतना पूर्वक अर्थात प्रत्येक कार्य में जड़ और जीव को भेद करते हुए करना चाहिए।

उन्होंने फरमाया विज्ञान का संबंध बाहर से है अर्थात् बाहरी वस्तुओं की खोज करना है वैसे ही आत्मा का संबंध भीतर से होता है, ज्ञान से मनुष्य जानता है, दृष्टि से श्रद्धा और आचरण से पाप का निरोध करता है। अहंकार व्यक्ति के ज्ञान में बाधक होता है इसलिए अहंकार का त्याग करना चाहिए। ज्ञानी व्यक्ति का व्यक्तित्व दर्पण की तरह पारदर्शी होता है उसका ज्ञान उसके गुणों में दिखाई देता है।

इससे पूर्व श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा ने अंतकृतदशांग का वांचन करते हुए फरमाया कि गजसुकुमाल का जीव अनादिकाल की यात्रा करके माता देवकी के गर्भ में आया। भगवान के समवसरण में आकर वैरागी हो जाता है उसके एक हाथ में संसार दूसरे हाथ में मोक्ष है। संसार से वैराग्य नहीं होगा तब तक सिद्धशिला का मार्ग प्रशस्त नहीं होगा। जब तक इस शरीर को पराया नहीं मानोगे तब तक वैराग्य नहीं आ सकता। यह अहसास गजसुकुमाल हो गया और उसमें वैराग्य आ गया। भगवान को केवलज्ञान में दिख रहा था रात को उपसर्ग आएगा भगवान को जीव का कल्याण दिखता हैं। गजसुकुमाल को सूर्यास्त के समय उपसर्ग आता है और वह उस उपसर्ग को समभाव से अपना कर्म जानकर स्व में स्थित रहते हैं, जिससे गजसुकुमाल सभी कर्मों का क्षय कर सिद्ध बुद्ध मुक्त हो जाते हैं

आज की सभा में श्री शमित मुनि जी म. सा ने ‘‘झूठा जग सपना, कोई नहीं अपना, प्रेरणा लाया है पर्व पर्युषण आया है।’’ भजन प्रस्तुत करते हुए अंतकृतदशांग सूत्र का मूल वांचन किया।

इस अवसर पर प्रत्यक्ष और परोक्ष में कई श्रावक-श्राविकाओं ने एकासन, आयंबिल, उपवास आदि तप के प्रत्याख्यान लिये।

- आचार्य शिवमुनि

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