
आदिश्वर धाम कुप्पकलां में शुक्रवार को एक दिवसीय बेसिक आत्म ध्यान धर्म यज्ञ का आयोजन शिवाचार्य आत्म ध्यान फाउण्डेशन द्वारा किया गया। कुप्पकलां केन्द्र में बड़ी संख्या में आत्मार्थी साधकों ने भाग लिया। आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव आचार्य सम्राट पूज्य डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. ने आत्मार्थी साधकों को आत्म ध्यान का प्रयोग करवाया। आचार्य श्री जी ने ‘सोह्म’ का उल्लेख करते हुए फरमाया कि सोहम् का अर्थ है कि जो मैं आत्मा हूं वही आत्मा सभी आचार्य श्री जी ने ‘सोह्म’ का उल्लेख करते हुए फरमाया कि सोहम् का अर्थ है कि जो मैं आत्मा हूं वही आत्मा सभी में है। ‘सोह्म’ का पहला अक्षर ‘सो’ अर्थात वह आत्मा जो सिद्धों, आचार्यों, उपाध्यायों में है वह सिद्ध आत्मा सभी में समान है। पूरे ब्रह्माण्ड में आत्म तत्व को जानें और समझें।
आचार्य भगवन् ने दैनिक उद्बोधन में पूज्यपाद कृत समाधि तंत्र की श्रृंखला में फरमाया कि सभी प्राणियों में आत्मा है। आत्मा के तीन प्रकार हैं – बहिरात्मा, अंतरात्मा और परमात्मा। आत्मार्थी साधक को अंतरात्मा द्वारा बहिरात्मा का त्याग कर उपाय पूर्वक अंतरात्मा को अंगीकार करना चाहिए। बहिरात्मा जो शरीर को आत्मा मानता है। शरीर जिसमें मेरा नाम, पुरुष, स्त्री, छोटा-बड़ा, माता-पिता, बहन-भाई, परिवार, संघ, समाज उसे ही अपना मानता है वह बहिरात्मा है। बहिरात्मा इन्द्रियों से परिचालक है, वह इन्द्रियों का गुलाम है, इन्द्रियां जो चाहे वह करा देती है। पांचों इन्द्रियों के तेईस विषयों में व्यक्ति आसक्त हो जाता है। जो आत्म ज्ञान से विमुक्त होता है वह अपने शरीर को ही अपनी आत्मा समझता है। शरीर यानि व्यक्तित्व का पोषण करता है।
आचार्य भगवन ने यह भी फरमाया कि परमात्मा में कोई कर्म मल नहीं होता। परमात्मा वह है जिसकी न काया है, न कर्म है, वह पूर्ण विशुद्ध आत्मा है। आत्मा को कर्म स्पर्श नहीं कर सकते है। आत्मा अरूपी, निराकार जो दिखाई नहीं देती, अनंत गुण आत्मा में है, जिसका सुख कभी कम नहीं होता, बढ़ता ही रहता है। सिद्ध भगवान संसार में नहीं आते वे सिद्धगति में रहते हैं यह परमात्मा का शुद्ध स्वरूप है।
आचार्य भगवन ने फरमाया कि जिस प्रकार पानी या कोई द्रव्य पदार्थ बोतल में रखो बोतल का आकार ले लेता है, सुराई में रखो सुराई का आकार ले लेता इसी प्रकार आत्मा का स्वरूप है आत्मा मनुष्य में गई तो मनुष्य बन गए, तिर्यंच में गई तो तिर्यंच का देह धारण कर लिया। देव में गई देव बन गया, नरक में गई तो नरक का नारकी बन गया।
प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने ऑनलाईन के माध्यम से एक दिवसीय आत्म ध्यान धर्म यज्ञ के आत्मार्थी साधकों की जिज्ञासाओं का समाधान किया।
ऑनलाईन के माध्यम से तपस्या करने वाले तपस्वियों ने उपवास, एकासन, आयंबिल का प्रत्याख्यान लिया।
आत्म भवन में प्रतिदिन प्रातः 6.15 से 7.15 आत्म ध्यान, प्रातः 9.30 से 10.30 स्वाध्याय, ध्यान एवं मंगल पाठ होगा। आप सभी लाभ लेकर अपन जीवन कृतार्थ करें।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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