कर्म मुक्ति में बाधक है |

- आचार्य शिवमुनि

21 OCTOBER 2025

प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी ने श्री उत्तराध्ययन सूत्र के 32वें अध्ययन ‘प्रमाद स्थान’ के विश्लेषण में फरमाया कि कोई भी कार्य करते हैं उसमें मन का विशेष महत्त्व होता है। एक आलस्य और दूसरा प्रमाद है। आलस्य मनुष्य के शरीर से संबंधित हैं प्रमाद मन से होता है। सबसे पहले मन में विचार उठते हैं। जब मन कषाय, विकथाओं में जाता है तो प्रमाद है और जब मन धर्म में जाता है तो करुणा मैत्री का भाव रहता है।

उन्होंने आगे फरमाया कि प्रमाद भी दो तरह के होते हैं एक द्रव्य प्रमाद दूसरा भाव प्रमाद है। द्रव्य का सेवन करने जब चेतना मूर्च्छित, कुंठित हो जाती है उसे द्रव्य प्रमाद कहते हैं जैसे मदिरा का सेवन आदि करना। दूसरा भाव प्रमाद वह है जिसमें व्यक्ति को क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए उसका भान नहीं रहता। अपने कर्त्तव्य के प्रति जागरूक नहीं रहता उसे भाव प्रमाद कहा गया है।

33वें अध्ययन ‘कर्म प्रकृति’ का विश्लेषण करते हुए प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी ने फरमाया कि संसार में जो कुछ भी दिखाई दे रहा है वह कर्म प्रकृति के अनुसार मिला है। जैसा कर्म करते हैं उसी अनुसार उसे जन्म मिलता है, कर्म भी मुक्ति में बाधक है। जो कर्मों पर विजय प्राप्त कर लेता है वह मुक्ति की ओर आगे बढ़ सकता है।

उन्होंने 34 वें अध्ययन ‘लेश्या’ के विवेचन में फरमाया कि मनुष्य के भाव बदलते रहते हैं द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव का परितर्वन लेश्या के आधार पर होता है। कर्मों का आत्मा के साथ चिपकने की क्रिया को लेश्या कहते हैं। लेश्या परिवर्तनशील होती है जो बदलती रहती है।
इससे पूर्व युवा मनीषी श्री शुभम मुनि जी एवं प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी ने श्री उत्तराध्ययन सूत्र के छत्तीसवें अध्ययन ‘जीवाजीव विभक्ति’ की 174 गाथाओं का मूल वांचन किया।

श्री शुभम मुनि जी ने श्री उत्तराध्ययन सूत्र वांचन से पूर्व एवं सम्पन्नता के पश्चात् आत्म ध्यान का प्रयोग करवाते हुए आज के तीन अध्ययन को सार रूप में व्याख्या करते हुए फरमाया कि श्री उत्तराध्ययन सूत्र के प्रमाद स्थान, कर्म प्रकृति और लेश्या इन अध्ययनों के स्वाध्याय से प्रेरणा मिलती है कि कहीं पर प्रमाद को स्थान नहीं देना चाहिए। सत्कर्म करते हुए अकर्म की ओर आगे बढना चाहिए। व्यक्ति के जैसे भाव होते हैं वैसी लेश्या होती है। जितने क्रूर भाव होंगे उतनी अशुभ लेश्या होगी। जितने सहज भाव होंगे उतनी शुभ लेश्या होगी।

नोट – आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी चार दिवसीय ध्यान साधना सम्पन्न कर बुधवार 22 अक्टूबर 2025 को नव वीर निवार्ण संवत का मंगल पाठ आत्म भवन अवध संगरीला में प्रदान करेंगे, जिसका जैनाचार्यजी यू-टयूब चैनल पर सीधा प्रसारण प्रातः 7.30 से किया जा सकेगा।

21 दिवसीय अनुष्ठान के अंतिम दिन श्री उत्तराध्ययन सूत्र वांचन प्रातः 7.30 बजे प्रारंभ होगा। 36वें अध्ययन की शेष 95 गाथाओं के वांचन के साथ ही अनुष्ठान का समापन होगा

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