






आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. ने घोड़दोड़ रोड स्थित शांति भवन में उपस्थित धर्म सभा को संबोधित करते हुए फरमाया कि जिस तरह से पानी को 100 डिग्री तापमान में गर्म करने पर भाप बनती है और भाप से रेल का इंजन चल जाता है। भाप, हवा में बहुत ताकत होती है उस शक्ति को उत्पन्न करने के लिए उस पानी को पहले 100 डीग्री तापमान में गर्म किया जाता है वैसे ही इस शरीर को साधने के लिए तपाना पड़ता है और जब पूर्ण रूप से तप जाता है तो साधक साधना कर मोक्ष की ओर जा सकता है। भगवान की वाणी के अनुसार भरत एरावत, महाविदेह तीनों लोकों में मोक्ष एक ही है, मोक्ष परमात्मा का मार्ग है। मोक्ष जाने के लिए स्वयं को ही पुरुषार्थ करना पड़ता है।
उन्होंने आगे फरमाया कि कोई भी देव दूसरे के कर्मों को काट नहीं सकता, अपने कर्म व्यक्ति को स्वयं भुगतने पड़ते हैं, भगवान ऋषभ, प्रभु महावीर ने भी अपने कर्मों को स्वयं काटा। व्यक्ति हंसी-मजाक में न जाने कितने कर्मों का बंध कर लेता है और फिर उसे भुगतना पड़ता है, इसलिए कर्मों के बंधन से बचने के लिए अपने स्वभाव में स्थित रहना चाहिए।
इससे पूर्व युवाचार्य श्री महेन्द्रऋषि जी म.सा. ने फरमाया कि जिस तरह से दही में से मक्खन और मक्खन से घी निकाल लेते हैं, उसी तरह इस संसार में जो सारभूत है उसे ग्रहण कर लेना चाहिए।
प्रवर्तक श्री प्रकाश मुनि जी म.सा. ने फरमाया कि धर्म करने के लिए कोई उम्र सीमा नहीं होती है धर्म किसी भी समय किसी भी उम्र किया जा सकता है।
इस अवसर पर सहमंत्री श्री शुभम मुनि जी म.सा. ‘‘आओ भगवन आओ इस अंतर मन में आओ’’, प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी म.सा. ने ‘‘आ गा ले प्रभु के
गीत तेरे दिन बीत जाते हैं’’ सुमधुर भजनों की प्रस्तुति दी।
इस अवसर पर साध्वी श्री संयम प्रभाजी म.सा. ने मुक्त होने के लिए गुरु वचनों को बार-बार चिंतन करने की बात कही।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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