आचार्य सम्राट डाॅ. शिवमुनि जी म.सा. ने पर्युषण पर्व के सातवें दिन अवध संगरीला परिसर के बैक्विट हाॅल में उपस्थित धर्म सभा को संबोधित करते हुए फरमाया कि कर्म निर्जरा का मूल मंत्र है सम्यक तप। व्यवहार दृष्टि से देखा जाए तो वृक्ष हो या फसल का बीज वह भी भूमि के ताप से अंकुरित होता है और उस एक बीज से हजारों बीज बन जाते हैं। मिट्टी का घड़ा अलाव में तपने के बाद ही घड़ा बनता है और फिर उसमें ठण्डा पानी होता है। बिना तपे बिना कष्ट सहे किसी वस्तु का निखार नहीं आ सकता। उसी तरह शरीर को तपाये बिना आत्मा का कल्याण नहीं हो सकता।
उन्होंने फरमाया कि भगवान ऋषभ ने जगत कल्याण के लिए बीड़ा उठाया तो एक हजार वर्ष तक तप किया। भगवान ऋषभ को तप करने के बाद केवल ज्ञान प्राप्त हुआ, केवल ज्ञान प्राप्त होने के बाद उन्होंने संसार को मोक्ष का मार्ग बताया। हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार ब्रह्मा ने तप के माध्य से सृष्टि का निर्माण किया।
उन्होंने फरमाया कि तप से पुराने कर्म क्षय हो जाते हैं। व्यक्ति को जीवन भोगने के लिए नहीं अपितु उसे साधने के लिए मिला है। चक्रवर्ती का पद बहुत-बहुत तप करते हैं तब उन्हें चक्रवर्ती का पद प्राप्त होता है।
उन्होंने फरमाया कि पर्युषण पर्व के दौरान पूरे भारत में तपस्याएं चल रही है। भगवान ने भी छह महीने, चार महीने का तप किया, कठोर से कठोर साढे बारह वर्ष तक तप किया था। अन का त्याग करना अनशन तप है। भूख से कम खाना चार रोटी की जगह तीन खाना वह उणोदरी तप होता है।
इससे पूर्व श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा ने अंतकृतदशांग का वांचन करते हुए फरमाया कि जिन शासन राजमार्ग है। प्रत्येक तीर्थंकर अपने आप में अपने तीर्थ का संस्थापक है क्योंकि लुप्त तीर्थ को वह पुनः स्थापित करते हैं। काल के प्रभाव से समय पर मार्ग भ्रमित हो जाते हैं पंचम आरे के प्रभाव से मूल मार्ग गौण हो गया और हम क्रियाकाण्ड करके कहते हैं धर्म कर लिया, चैबीस घंटे जो कार्य करना था उसे गौण कर दिया और जिसको थोड़ी देर के लिए समय देना था उसे सारा समय दे दिया ऐसा समय समय पर होता है और समय समय पर तीर्थंकर भगवान पधारते हैं पहले स्वयं शोध करते हैं स्वयं उस मार्ग को खोजते हैं और खोजकर वापस उस राजमार्ग को खोलते हैं।
आज की सभा में श्री शमित मुनि जी म. सा. ने अंतकृतदशांग सूत्र का मूल वांचन किया।
इस अवसर पर प्रत्यक्ष और परोक्ष में कई श्रावक-श्राविकाओं ने एकासन, आयंबिल, उपवास आदि तप के प्रत्याख्यान लिये।
विशेष – दिनांक 8 सितम्बर को संवत्सरी महापर्व का आयोजन आचार्य सम्राट डाॅ. शिव मुनि जी म.सा. के सान्निध्य में आयोजित होगा। जिसमें रविवार को प्रातः 7 बजे से 8 बजे तक वीतराग साधिका निशाजी द्वारा शुक्ल ध्यान का प्रयोग। प्रातः 8.15 से 9.30 तक प्रमुख मंत्री श्री शिरीषमुनि द्वारा अन्तकृतदशांग सूत्र का वांचन होगा। प्रातः 9.30 से 10.30 तक आचार्य सम्राट डाॅ. शिवमुनि जी म. सा. का विशेष प्रवचन होगा। प्रातः 10.30 बजे से प्रत्याख्यान, ध्यान एवं मंगल पाठ होंगे।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
WhatsApp us
