कर्मों को काटने का साधन है शरीर |

- आचार्य शिवमुनि

30 July 2026

आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव आचार्य सम्राट पूज्य डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि साधु जीवन पर्यन्त अरिहंत परमात्मा के मार्ग पर चलते हैं। जैन दर्शन में एक मात्र आत्मा को महत्व दिया गया है। शरीर से आत्मा निकल जाए तो शरीर का कोई महत्व नहीं। सबसे शक्तिशाली आत्मा है। पहले गर्भ में आत्मा प्रवेश करती है तभी शरीर का निर्माण होता है|

आचार्य भगवन ने आगे फरमाया कि शरीर कर्म को काटने का साधन है। शरीर तीन प्रकार होते हैं – औदारिक, तैजस और कार्मण। तेजस शरीर से भोजन पचता है। जीव विभाव अवस्था में जाकर कार्मण शरीर पर कर्म लेकर आता है। व्यक्ति प्रतिपल, प्रतिक्षण कार्मण शरीर का निर्माण कर रहे हैं। कार्मण शरीर को घटाना है तो उसका एक ही रास्ता है भेदज्ञान। जड़ और जीव को अलग करना। व्यक्ति जितने समय अपने में ठहर जाता है तो कर्मों की निर्जरा होती है और कार्मण शरीर कम होता है। प्रवचन के पश्चात् आचार्य भगवन ने उपस्थित धर्म सभा को आत्म ध्यान का प्रयोग करवाया।

इससे पूर्व प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि बंध का अर्थ है कर्मों को आत्मा से बांध लेना। आत्मा पूरी तरह शुद्ध होती है, कर्मों का संबंध जब उससे होता है तो अपना रूप विकृत हो जाता है जिसे जैन धर्म में बंध तत्व कहा है। मुक्ति आत्म साधना से होती है। साधना का आधार है बंध तत्व का ज्ञान। जब तक बंध को नहीं रोकोगे एक तरफ से निर्जरा एक तरफ से बंध हो रहा है। कर्म बंधन के कारणों का ज्ञान हो तो उन कारणों को दूर किया जा सकता है। मुक्ति आत्म साधना से होती हैं। साधना का आधार है बंध तत्व का ज्ञान। 

श्री शाश्वत मुनि जी म. सा. ने ‘‘उठ जाग मेरे चैतन्य प्रभू’’ भजन के द्वारा अपनी भावनाएं व्यक्त की।  
 
आत्म भवन में प्रतिदिन प्रातः 6.15 से 7.15 आत्म ध्यान, प्रातः 9.30 से 10.30 स्वाध्याय, ध्यान एवं मंगल पाठ होगा। आप सभी लाभ लेकर अपने जीवन कृतार्थ करें।

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