


श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. के सान्निध्य में आत्म ध्यान धर्म यज्ञ का आयोजन शिवाचार्य आत्म ध्यान फाउण्डेशन, नाशिक (महाराष्ट्र), कुप्पकलां (पंजाब), जम्मू एवं अम्बाला में आयोजित हो रहा है, जिसका सीधा प्रसारण सूरत से किया जा रहा है।
लाईव प्रसारण पर प्रसारित आत्म ध्यान धर्म यज्ञ के तृतीय दिवस पर आचार्य भगवन ने आत्म ध्यान का प्रयोग करवाते हुए फरमाया कि दो तत्व हैं आत्मा और शरीर। आकार में निराकार आत्मा हैं। देह जड़ है, देह में मन, बुद्धि, इन्द्रियां है, मनुष्य के विचार, धारणा, परिवार, संपति है उसे अपना माना रखा है, वह सब इस देह का है। देह के भीतर निराकार आत्मा है वह सत्य है। आत्मा और शरीर दोनों अलग-अलग हैं उसका भेद करें। व्यक्ति ने जन्मों-जन्मों तक आकार को महत्त्व दिया। आकार को अपना मानते हुए मिथ्यात्व का पोषण किया और कई जन्म गंवा दिये। जब शरीर से आत्मा निकल जाए तो उस शरीर को एक रात भी नहीं रख पाते। सब बदल जाता है, जिस घर का मालिक था वह चला जाता है तो वह घर किसी ओर के नाम हो जाता है।
उन्होंने आगे फरमाया कि आत्मा है तो कान से सुनाई देता है, आंखों से देखा जाता है, नासिका से गंध का अहसास किया जाता है, जीव्हा से स्वाद को चखा जाता है। शरीर की क्रिया-प्रतिक्रिया होती है, खून बनता है, शरीर सार को ग्रहण करता है और निस्सार को छोड़ देता है। यह सब जीव के कारण है। जब व्यक्ति कहता है कि मैंने धन कमाया, मैंने मकान बनाया यह सब कर्त्ता-भोक्ता के भाव हैं जो मोह का पोषण करते हैं।
जैन दर्शन का मूल सिद्धांत है भेद विज्ञान। जड़ और जीव का भेद आकार और निराकार दोनों साथ है किंतु दोनों के गुणधर्म अलग-अलग है। कभी आकार निराकार और निराकार आकार नहीं बन सकता। जड़ जीव और जीव जड़ नहीं बन सकता। दोनों अलग-अलग है इसे गहराई से समझें। मैं जीवात्मा हूं, देह नहीं हूं। मैं मन, बुद्धि, विचार नहीं हूं। आज तक मैं विचार हूं इसे महत्त्व दिया। यदि मन में संकल्प विकल्प है, विचार धारणा है तो आते-जाते श्वांस को दृष्टा भाव से देखने और जानने से मन के विचार धीरे-धीरे शांत होते हैं।
प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि जैन धर्म का मुख्य सिद्धांत भेद विज्ञान है। भेद विज्ञानी साधक शरीर को संयमित कर सारा ध्यान जीव पर केन्द्रित कर देता है। ध्यान आत्मा पर केन्द्रित कर शरीर का उपयोग आत्मा की साधना के लिए करने वाला कर्म सिद्धांत पर विश्वास करता है। कर्म सिद्धांत को देखकर वैराग्य जागता है जब मृगापुत्र ने मुनि को देखा तो जाति स्मरण ज्ञान हो गया और वह मुनि बन गया। देह के प्रति आसक्ति है उसे छोड़ने के लिए प्रयोग करना है। आत्मा पर जितनी अधिक श्रद्धा उतनी ही देह की आसक्ति छूटती जाएगी।
मधुर गायक श्री निशांत मुनि जी म.सा. ने ‘‘अनंत शक्ति भण्डार यह चेतन हमारा, यह चेतन हमारा’’ सुमधुर भजन की प्रस्तुति देते हुए अपने विचार व्यक्त किये।
इस अवसर पर मुंबई से श्री कांतिकुमार जैन परिवार गुरु दर्शन हेतु उपस्थित हुआ। श्री ऑल इण्डिया जैन कॉन्फ्रेन्स के राष्ट्रीय युवा शाखा के मंत्री श्री अमित कुमार जैन ने अपनी भावनाएं व्यक्त की। पूना, चैन्नई, शिरडी से गुरु भक्त दर्शन हेतु उपस्थित हुए।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
WhatsApp us
