
प्रमुखमंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में श्री उत्तराध्ययन सूत्र की व्याख्या करते हुए केवली कपिल मुनि के जीवन के दृष्टांत का विवेचन करते हुए फरमाया कि कपिल के बचपन में पिता का साया उठ जाता है तो वह अध्ययन के लिए दूसरे नगर में जाता है। अध्ययन के समय वह दासी के मोह में फंस जाता है। फिर उसे परिवार चलाने के लिए धन की चिंता सताती है। एक नगर में सेठ प्रातःकाल भोर में दो मासा सोना बांटता है, दो मासे सोने के लिए वह रात में ही निकल जाता है। राजा के सिपाही रात को चोर समझकर पकड़ लेते हैं और सुबह राजा के दरबार में उसे उपस्थित करते हैं तो वह सारी सच्चाई राजा को बताता है। राजा उसकी ईमानदारी को देखकर वचन देता है कि जो चाहे मांग लो, राजा उसे सोचने के लिए समय देता है। कपिल सोचता है और विचार करते-करते उसे आत्म बोध हो जाता है और वह संत बनकर जंगल की ओर प्रस्थान कर लेता है।
इसी प्रकार हर व्यक्ति के जीवन में इस तरह की घटनाएं होती है किंतु उसका सार यह है कि जब कोई व्यक्ति संसार में पड़ता है तो संसार की वस्तुएं चाहिए उसके लिए चिंता और आर्त्त-रौद्र ध्यान करता है। वर्तमान में सारा संसार ही आर्त्त-रौद्र ध्यान में उलझा हुआ है और दुःखी है। कपिल मुनि एक प्रेरक है, पहला पड़ाव गरीबी और पिता का संसार से चले जाना। दूसरा पड़ाव पढ़ने जाना है। तीसरा पढाई में मन नहीं लगा और मोह में पड़ गया। जब वह मोह पड़ा तो संसार की चिंता सताने लग जाती है।
उन्होंने आगे फरमाया कि जैसे कपिल ने छोटी सी गलती की और पकड़ा गया। जो व्यक्ति पहली गलती में पकड़ा जाता है वह गलत रास्ते पर नहीं चलेगा। यह जीवन की स्थितियां है, पड़ाव है। कपिल भी पकड़े जाने पर झूठ नहीं बोला सरलता से सारा वृतांत बता दिया। सरलता और सत्य का प्रभाव होता है कि धर्म भी वहीं ठहरता है जहां सरलता है, शुद्ध हृदय है। कपिल भी धार्मिक जीव था, सत्यवादी था, इसलिए राजा प्रसन्न हो गया। सत्य से प्रभावित होकर राजा ने वरदान दे दिया कि जो चाहे मांग लो। वरदान भी उसके लिए चिंतन का कारण बना और वैराग्य का निमित बना।
कपिल दासी के मोह में पड़कर यदि दासी के पास चला जाता तो वहीं संसार में उलझा रहता उसने न दासी की तरफ देखा, न अपनी मां की ओर देखा वह अपनी आत्मा को जागृत कर एकांत में जंगल में चला गया। वैराग्य की प्रथम पंक्ति यही है कि इस जीव का कोई नहीं है। जीव अकेला है इस एकत्व भाव के साथ जीता है वही साधक आगे बढ़ता है।
जो मोह में रहता है उसमें वैराग्य नहीं आ सकता। जब अंतःकरण से वैराग्य स्पष्ट हो जाता है तो फिर वह जीव के बारे में सोचता है। केवली भगवान किसी की वृत्ति को महत्त्व नहीं देते। वृत्तियों को देखने वाला दुःखी होता है और आत्मा को देखने वाला सुखी रहता है।
इससे पूर्व प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी म.सा. ने कपिल केवली की कथा को विस्तार से सुनाते हुए अपने भाव व्यक्त किये।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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