आंतरीक सुख है आत्मा का |

- आचार्य शिवमुनि

3 August 2026

आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव आचार्य सम्राट पूज्य डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि व्यक्ति धन, वैभव को सुख मानता है जो उसके पुण्य कर्मों से मिला है, किंतु वह सुखाभास है। आंतरिक सुख तो आत्मा का है।

आचार्य भगवन ने शालीभद्र का उदाहरण देते हुए आगे फरमाया कि शालीभद्र की मां ने अपने बेटे के लिए खीर बनाई। शालीभद्र ने चिंतन किया की कोई संत-मुनिराज आ जाए तो मैं यह खीर उन्हें दान दे दूं। कुछ देर बाद उधर से मुनिराज आए तो शालीभद्र ने वह खीर उन्हें दी और उनकी मां आई तो उन्हें बताया नहीं। कोई भी अच्छा कार्य करो तो बताना नहीं चाहिए।

आचार्य भगवन ने फरमाया कि धन्नासेठ, शालीभद्र की कहानियों से वैराग्य जागता है। शालीभद्र का दिया हुआ दान इतना कमाल कर गया कि उसे स्वर्ग से 32-32 पेटियां अन्न धान्य की आदि प्राप्त होती थी। पूर्व जन्म में ऐसी समृद्धि पाई और उस समृद्धि के द्वारा स्वयं को धर्म मार्ग की ओर अग्रसर किया।

आचार्य भगवन ने आगे फरमाया कि समाधि तंत्र ग्रथ में आचार्य पूज्यपाद कह रहे हैं कि जिन्हें अतिन्द्रिय सुख की इच्छा है उनके लिए ग्रंथ की रचना कर रहा हूं। अतिन्द्रिय सुख आत्मा का है। शरीर की पांचों इन्द्रियों का सुख, सुख नहीं वह सुखाभास है। जिस तरह से मिश्री और नमक के स्वाद को चखकर ही उसके स्वाद का अनुभव किया जा सकता है उसी तरह आत्मा के सुख को देख नहीं सकते उसका अनुभव किया जा सकता है।

प्रवचन के पश्चात् आचार्य भगवन ने सभी श्रावक-श्राविकाओं को आत्म ध्यान का प्रयोग करवाया।

प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि जब तक पुद्गल की पकड़ है तब तक आत्मानुभूति नहीं हो सकती। मनुष्य भ्रांति के कारण विभाव में चला जाता है। जिस तरह से एक संगीतज्ञ या भजन कलाकार गुनगुनाकर उसका रियाज करता है उसी तरह आत्मार्थी साधक आत्मा को आत्मा में स्थित

करने के लिए अभ्यास करता है तो वह आत्मज्ञ बन सकता है।

श्री शाश्वत मुनि जी म. सा. ने ‘‘दुनिया में देव अनेकों अरिहंत देव का क्या कहना’’ भजन के द्वारा अपनी भावनाएं व्यक्त की।

आत्म भवन में प्रतिदिन प्रातः 6.15 से 7.15 आत्म ध्यान, प्रातः 9.30 से 10.30 स्वाध्याय, ध्यान एवं मंगल पाठ होगा। आप सभी लाभ लेकर अपन जीवन कृतार्थ करें।

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